पोरा तिहार : जब छत्तीसगढ़ की माटी, किसान और बैलों के रिश्ते में दिखती है संस्कृति की असली तस्वीर
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रायपुर। 10/9/2026
छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी प्राकृतिक संपदा जितनी ही उसकी लोक परंपराओं और ग्रामीण जीवन से भी जुड़ी है। यहां के त्योहार केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं होते, बल्कि उनमें मेहनत, प्रकृति, खेती, पशुधन और सामाजिक रिश्तों की गहरी झलक दिखाई देती है। पोरा तिहार भी ऐसी ही समृद्ध लोक परंपरा है, जिसमें किसान और उसके सबसे भरोसेमंद साथी बैल के प्रति सम्मान का भाव दिखाई देता है।
खेती-किसानी की संस्कृति में बैल का स्थान सदियों से महत्वपूर्ण रहा है। खेत की जुताई से लेकर कृषि कार्यों में किसान का साथ देने वाले इन पशुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर ही पोरा तिहार को विशेष बनाता है। इस दिन बैलों को नहलाकर सजाया-संवारा जाता है। उनके सींगों को रंगों से सजाया जाता है, गले में घंटियां और फूल-मालाएं पहनाई जाती हैं और पूरे सम्मान के साथ उनकी पूजा की जाती है।
यह सिर्फ त्योहार नहीं, किसान की कृतज्ञता है
पोरा तिहार की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें किसान अपने पशुधन को केवल उपयोग का साधन नहीं, बल्कि अपनी खेती और जीवन का साथी मानकर सम्मान देता है। खेत में किसान के साथ दिन-रात मेहनत करने वाले बैलों के प्रति आभार व्यक्त करने की यह परंपरा छत्तीसगढ़ की संवेदनशील और श्रमप्रधान संस्कृति को सामने लाती है।
आज खेती में आधुनिक मशीनों और तकनीक का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद पोरा तिहार यह याद दिलाता है कि छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति की जड़ें आज भी गांव, खेत, मिट्टी और पशुधन से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
मिट्टी के नंदिया-बैल से जुड़ता बचपन
पोरा तिहार का एक महत्वपूर्ण पक्ष बच्चों से भी जुड़ा है। इस अवसर पर मिट्टी से बने नंदिया-बैल, बैलगाड़ी और पारंपरिक खिलौनों का विशेष आकर्षण रहता है। बच्चे इन्हें सजाते हैं, पूजा करते हैं और खेल के माध्यम से अपनी लोक संस्कृति को समझते हैं।
दरअसल, मिट्टी के ये छोटे-छोटे खिलौने केवल खिलौने नहीं हैं। वे नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने वाली एक जीवंत कड़ी हैं। आधुनिक मोबाइल और डिजिटल मनोरंजन के दौर में पारंपरिक खिलौनों की यह दुनिया हमारी लोक विरासत को बचाए रखने का संदेश भी देती है।
त्योहार में दिखाई देती है छत्तीसगढ़ी रसोई की खुशबू
पोरा तिहार के साथ छत्तीसगढ़ के पारंपरिक व्यंजनों की भी अपनी अलग पहचान है। घरों में तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं और परिवार के लोग मिलकर त्योहार की खुशियां साझा करते हैं। यह परंपरा केवल स्वाद तक सीमित नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के पारिवारिक और सामुदायिक जीवन की आत्मीयता को भी दर्शाती है।
लोक परंपराओं को बचाए रखना समय की जरूरत
तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में लोक त्योहारों का महत्व और बढ़ जाता है। ऐसे पर्व हमें याद दिलाते हैं कि विकास और आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखना भी जरूरी है।
पोरा तिहार इसी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। यह हमें किसान की मेहनत का सम्मान करने, पशुधन के प्रति संवेदनशील रहने और अपनी लोक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश देता है।
संपादकीय दृष्टि से पोरा तिहार का संदेश
किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी आधुनिकता से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपनी जड़ों को कितना संभालकर रखता है। छत्तीसगढ़ के लिए पोरा तिहार ऐसी ही जड़ों की याद है।
जहां खेत किसान की मेहनत की कहानी कहते हैं, वहीं बैलों की घंटियां उस साझेदारी की गवाही देती हैं, जिसने पीढ़ियों तक छत्तीसगढ़ की खेती को आगे बढ़ाया।
पोरा तिहार इसलिए महज एक पारंपरिक पर्व नहीं, बल्कि माटी, मेहनत, पशुधन और संस्कृति के बीच बने उस रिश्ते का उत्सव है, जिसने छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन को अपनी अलग पहचान दी है।
आज जरूरत है कि हम इन लोक परंपराओं को केवल त्योहार के एक दिन तक सीमित न रखें, बल्कि इनके पीछे छिपे मूल्यों को समझें और आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाएं। क्योंकि संस्कृति वही जीवित रहती है, जिसे समाज अपनी रोजमर्रा की जिंदगी और नई पीढ़ी के साथ जोड़कर रखता है।
पोरा तिहार की गाड़ा-गाड़ा बधाई।
छत्तीसगढ़ की माटी, किसान और लोक संस्कृति को नमन।
— 36गढ़ न्यूज अपडेट
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