संपादकीय— पद्मिनी श्रीवास
आज AI और सोशल मीडिया ने सूचना की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। एक तस्वीर, एक वीडियो या कुछ शब्द देखते ही देखते हजारों लोगों तक पहुंच जाते हैं। यह तकनीक जहां समाज के लिए अवसर लेकर आई है, वहीं इसके गलत इस्तेमाल ने व्यक्ति की निजता, सम्मान और प्रतिष्ठा को लेकर कई गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं।
एक पत्रकार होने के नाते मैं लंबे समय से जनहित से जुड़े मुद्दों पर अपनी आवाज उठाती रही हूं। साइबर ठगी हो, महिलाओं की सुरक्षा हो या आम नागरिकों की समस्या—हम अपना समय और संसाधन लगाकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास करते हैं। लेकिन जब इसी सोशल मीडिया का इस्तेमाल किसी पत्रकार या महिला की तस्वीर और पहचान को लेकर भ्रामक सामग्री फैलाने में किया जाए, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।
हाल ही में मेरी फेसबुक पर उपलब्ध तस्वीर का इस्तेमाल करते हुए ऐसी सामग्री सामने आई, जिसमें ‘ठगी’ और ‘वसूली’ जैसे गंभीर शब्दों का इस्तेमाल किया गया। मैंने इस संबंध में शिकायत भी की। मेरा सवाल किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया से है—क्या किसी महिला की तस्वीर के साथ गंभीर शब्द जोड़कर सामग्री प्रकाशित करने से पहले तथ्यों की पुष्टि करना जरूरी नहीं है?
अगर किसी तस्वीर या वीडियो को लेकर शिकायत सामने आती है, तो केवल उसे देखकर निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। उसकी शुरुआत कहां से हुई, किसने तस्वीर का इस्तेमाल किया, सामग्री किसने तैयार की और वह किस तरह वायरल हुई—इन सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

आज हम साइबर अपराध से बचने के लिए लोगों को जागरूक करते हैं। लोगों से कहते हैं कि अनजान लिंक पर क्लिक न करें, अपनी तस्वीर और निजी जानकारी सुरक्षित रखें और ऑनलाइन ठगी से सावधान रहें। लेकिन उसी समाज में यदि किसी व्यक्ति की तस्वीर का गलत संदर्भ में इस्तेमाल होता है, तो उसकी शिकायत को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
किसी खबर का वायरल होना उसकी सच्चाई की गारंटी नहीं है।
आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है। खबर सबसे पहले देने की होड़ में कहीं-कहीं खबर की पुष्टि पीछे छूट जाती है। कॉपी-पेस्ट आसान है, लेकिन किसी खबर की तह तक पहुंचना मेहनत मांगता है। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा से जुड़ी बात हो तो यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
एक पत्रकार के पास केवल सोशल मीडिया की ID या कोई पहचान-पत्र होना पर्याप्त नहीं है। पत्रकारिता की असली पहचान उसके काम, तथ्य, निष्पक्षता, सामाजिक सरोकार और जिम्मेदार व्यवहार से होती है। इसलिए पत्रकारिता से जुड़े किसी भी व्यक्ति के काम, शैक्षणिक योग्यता या सामाजिक योगदान को लेकर सवाल हों तो उनकी जांच भी तथ्यों और नियमों के आधार पर होनी चाहिए—न कि धारणा या व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर।
इसी तरह किसी पत्रकार या महिला के खिलाफ शिकायत हो तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। न शिकायत को दबाया जाना चाहिए, न बिना जांच किसी को दोषी ठहराया जाना चाहिए।
महिला सशक्तिकरण केवल मंचों से बोले जाने वाले शब्द नहीं हैं। महिला सशक्तिकरण तब दिखाई देता है, जब एक महिला अपनी बात लेकर किसी संस्था या पुलिस के पास जाए और उसकी बात को सम्मानपूर्वक सुना जाए। उसकी शिकायत छोटी हो या बड़ी, प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ी हो या सामान्य नागरिक से—जांच का आधार केवल और केवल तथ्य होना चाहिए।
एक बेटी जब जन्म लेती है तो वह अपने साथ एक परिवार की उम्मीद लेकर आती है। लेकिन जब वही बेटी समाज में अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करती है, तो उसके सामने कई तरह की धारणाएं, टिप्पणियां और सवाल खड़े हो जाते हैं। हर इंसान पूरी तरह सही नहीं होता और हर इंसान पूरी तरह गलत भी नहीं होता। इसलिए किसी के बारे में राय बनाने से पहले सच जानना जरूरी है।
छत्तीसगढ़ में महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा को लेकर कई स्तरों पर प्रयास होते हैं। ऐसे में यह भी जरूरी है कि किसी महिला द्वारा की गई शिकायत को केवल इसलिए नजरअंदाज न किया जाए कि वह छोटी दिखाई देती है। कई बार छोटी दिखने वाली ऑनलाइन घटना आगे चलकर किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक शांति पर बड़ा असर डाल सकती है।
मेरी यह बात किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं है। यह उस व्यवस्था और उस पत्रकारिता से एक आग्रह है, जिसका हिस्सा हम सभी हैं—
खबर बनाइए, लेकिन पहले सच जानिए।
तस्वीर लगाइए, लेकिन उसका संदर्भ समझिए।
आरोप लिखिए, लेकिन तथ्य जांचिए।
और किसी महिला की शिकायत सुनिए, तो उसकी आवाज को सिर्फ इसलिए छोटा मत समझिए क्योंकि वह अकेली है।
आज AI के दौर में खबर बनाना पहले से आसान हो गया है, लेकिन सच्ची पत्रकारिता करना पहले से ज्यादा जिम्मेदारी का काम हो गया है।
हमें खबर को सिर्फ ट्रेंडिंग नहीं बनाना है, उसे तथ्यपूर्ण और जिम्मेदार बनाना है।



