खतरे की बीच जी रहा जनता ,गैस माफियाओं पर किसका संरक्षण ?

तिल्दा-नेवरा में गैस सिलेंडर की कालाबाजारी अब कोई “राज़” नहीं, बल्कि खुलेआम चल रहा ऐसा कारोबार बन चुका है, जिसे देखने के लिए किसी जांच टीम की नहीं, बस आम आदमी की आंखें ही काफी हैं। शहर में जगह-जगह अवैध रिफिलिंग और भंडारण की खबरें लगातार सामने आ रही हैं, अखबारों में चिन्हित स्थानों तक का खुलासा हो चुका है, लेकिन प्रशासन की नींद शायद इतनी गहरी है कि न तो धमाके का डर है, न ही जनता की सुरक्षा की चिंता।
कहने को तो संबंधित विभागों के पास सूचना भी पहुंच चुकी है, शिकायतें भी हो चुकी हैं, पर कार्रवाई के नाम पर वही पुराना “देखेंगे, जांच करेंगे” वाला रटा-रटाया संवाद सुनाई देता है। लगता है जैसे अधिकारी जांच नहीं, बल्कि सही समय का इंतजार कर रहे हों—शायद तब, जब कोई बड़ा हादसा हो जाए और जिम्मेदारी तय करने के लिए कागजों का खेल शुरू किया जा सके।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि अवैध कारोबारियों का हौसला दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। बिना किसी डर के खुलेआम सिलेंडरों की रिफिलिंग हो रही है, मानो उन्हें किसी अदृश्य सुरक्षा कवच का आशीर्वाद प्राप्त हो। अब सवाल यह उठता है कि यह “कवच” आखिर किसका है? क्या यह महज लापरवाही है या फिर कोई ऐसी चुप्पी, जो बहुत कुछ कहती है?
जनता के लिए यह सिर्फ महंगाई या असुविधा का मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जान-माल की सुरक्षा का सवाल है। लेकिन अफसोस, जिम्मेदारों के लिए यह शायद फाइलों में दबा एक मामूली मामला भर है। तिल्दा-नेवरा में कालाबाजारी का यह खेल जितना खतरनाक है, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक है प्रशासन की यह चुप्पी—जो हर गुजरते दिन के साथ और भी संदिग्ध होती जा रही है।


