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के विद्यालयों में स्थानीय संस्कृति को शिक्षा से जोड़ने की पहल, मुख्यमंत्री को भेजा गया प्रस्ताव

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10/07/ 2026

रायपुर।छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और विद्यार्थियों को अपनी जड़ों से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। बस्तर विकास एवं सेवा संस्थान द्वारा संचालित बस्तर संस्कृति ग्रुप (लोकरंग) के संयोजक सिद्धार्थ महाजन ने मुख्यमंत्री के नाम पत्र प्रेषित कर राज्य के सभी शासकीय एवं निजी विद्यालयों में छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, जनजातीय परंपराओं, लोककलाओं एवं स्थानीय त्योहारों पर नियमित जागरूकता और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने की मांग की है।

पत्र में कहा गया है कि “जो समाज अपनी संस्कृति को नहीं सहेजता, वह अपने गौरवशाली इतिहास और अपनी जड़ों से दूर हो जाता है।” इसी विचार को आधार बनाते हुए विद्यालय स्तर पर सांस्कृतिक शिक्षा को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई गई है।

पत्र के अनुसार, छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, जनजातीय विरासत, लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक रीति-रिवाजों के कारण पूरे देश में विशिष्ट पहचान रखता है। लेकिन बदलती जीवनशैली, आधुनिक तकनीक और मोबाइल संस्कृति के बढ़ते प्रभाव से नई पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होती जा रही है। यदि समय रहते विद्यालयों में स्थानीय संस्कृति को शिक्षा का हिस्सा नहीं बनाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर से अनभिज्ञ रह जाएंगी।

प्रस्ताव में सुझाव दिया गया है कि विद्यालयों में हरेली, पोला, तीजा, छेरछेरा, मड़ई, बस्तर दशहरा, नवाखाई और गोंचा जैसे प्रमुख लोक पर्वों का महत्व विद्यार्थियों को बताया जाए। साथ ही पंथी, राउत नाचा, सुआ, करमा, गेंड़ी, पंडवानी, ददरिया, लोकगीत, ढोकरा शिल्प, बांस एवं लकड़ी की हस्तकलाओं तथा जनजातीय संस्कृति का व्यावहारिक परिचय भी कराया जाए, ताकि विद्यार्थी अपनी सांस्कृतिक विरासत को निकट से समझ सकें।

पत्र में विद्यार्थियों में राष्ट्रप्रेम और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ एवं देश के वीर शहीदों तथा महान विभूतियों के जीवन एवं योगदान पर विशेष कार्यक्रम आयोजित करने का भी सुझाव दिया गया है।

इसके अतिरिक्त प्रत्येक विद्यालय में प्रतिमाह “अपनी संस्कृति–अपनी पहचान” विषय पर सांस्कृतिक परिचय कार्यक्रम आयोजित करने की मांग की गई है। इसके अंतर्गत लोक कलाकारों के व्याख्यान, लोककला प्रदर्शनियां, सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं, जनजातीय संस्कृति आधारित गतिविधियां तथा स्थानीय परंपराओं पर विशेष आयोजन किए जाने का प्रस्ताव रखा गया है।

सिद्धार्थ महाजन का कहना है कि ऐसे कार्यक्रमों से विद्यार्थियों में अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान, सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक संरक्षण की भावना मजबूत होगी। उन्होंने राज्य शासन से इस संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर प्रदेश के सभी विद्यालयों में नियमित सांस्कृतिक गतिविधियां प्रारंभ करने का आग्रह किया है। इस संबंध में पत्र की प्रतिलिपि स्कूल शिक्षा मंत्री को भी प्रेषित की गई है।

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