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पर्यावरण संरक्षण के संदेश से गूंजा संकेत साहित्य समिति का काव्य आयोजन


अगर पेड़ कट जाएंगे तो क्या हम सब बच पाएंगे…” — गिरीश पंकज


वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीनारायण लहरे
रायपुर।
पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण एवं प्रकृति संवर्धन के उद्देश्य से संकेत साहित्य समिति रायपुर द्वारा वृंदावन हॉल में पर्यावरण प्रबंधन एवं प्रदूषण नियंत्रण विषय पर केंद्रित भव्य सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में साहित्यकारों और कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का प्रभावशाली संदेश दिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार गिरीश पंकज रहे, जबकि अध्यक्षता भाषाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चितरंजन कर ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ बाल साहित्यकार बलदाऊ राम साहू, वरिष्ठ साहित्यकार सुरेंद्र रावल एवं डॉ. मृणालिका ओझा उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की पूजा-अर्चना एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। संकेत साहित्य समिति की ओर से अतिथियों का अंगवस्त्र, मोतियों की माला एवं श्रीफल भेंट कर सम्मान किया गया।
संकेत साहित्य समिति के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि पर्यावरण संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने वन, जल और प्रकृति के महत्व को रेखांकित करते हुए समाज से अधिकाधिक पौधारोपण का आह्वान किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. चितरंजन कर ने कहा कि पर्यावरण प्रदूषण मूलतः मानव के मानसिक प्रदूषण का परिणाम है। जब तक व्यक्ति स्वयं जागरूक नहीं होगा, तब तक प्रकृति संरक्षण की दिशा में सार्थक परिवर्तन संभव नहीं है।
मुख्य अतिथि गिरीश पंकज ने कहा कि प्रकृति और मानव जीवन का गहरा संबंध है तथा साहित्य समाज को जागरूक करने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने अपनी पंक्तियों—
“अगर पेड़ कट जाएंगे तो क्या हम सब बच पाएंगे,
बस विकास के नाम पर केवल झुलस-झुलस मर जाएंगे।”
— के माध्यम से अंधाधुंध विकास और पर्यावरण विनाश पर चिंता व्यक्त की।
कवयित्री पल्लवी झा के प्रभावशाली संचालन में आयोजित काव्य गोष्ठी में प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए साहित्यकारों एवं कवियों ने पर्यावरण संरक्षण, जल संकट, वृक्षों की महत्ता और प्रकृति संवेदना पर केंद्रित रचनाओं का पाठ किया।
काव्य गोष्ठी में प्रस्तुत कुछ प्रमुख पंक्तियाँ विशेष रूप से सराही गईं—
“पेड़ लगाओ वन बढ़ाओ, समय की है पुकार…”
— डॉ. रविंद्रनाथ सरकार
“गौरैया दिखती नहीं, नई सदी के गाँव…”
— राजेश जैन ‘राही’
“पेड़ों से जीवन है, तुम उसे न काटना…”
— डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’
“ये प्रदूषण की है इंतिहाँ, हम धरा को बचाएँ चलो…”
— रामचंद्र श्रीवास्तव
“कइसे करँव मैं जतन धरती के, जंगल कटावथे…”
— दिलीप टिकरिहा ‘छत्तीसगढ़िया’
कार्यक्रम में डॉ. चितरंजन कर, गिरीश पंकज, डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, बलदाऊ राम साहू, सुरेंद्र रावल, डॉ. मृणालिका ओझा, रामेश्वर शर्मा, संजीव ठाकुर, शशि सुरेंद्र दुबे, डॉ. रविंद्र सरकार, बीबीपी मोदी, पल्लवी झा, गणेशदत्त झा, पूर्वा श्रीवास्तव, सुषमा पटेल, हरीश कोटक, राजकुमार सोनी, छबिलाल सोनी, रूपाली चक्रवर्ती, यशवंत यदु, मन्नूलाल यदु, रविश गुप्ता, विवेक रहाटगांवकर, मुरलीधर गोंडाने, गोपाल सोलंकी, अंबर शुक्ला, राजेंद्र रायपुरी, प्रदीप कुमार मिश्रा, रामचंद्र श्रीवास्तव, एच.एल. चंद्राकर, दिलीप वरवंडकर, सिद्धार्थ श्रीवास्तव, चेतन भारती, राजेंद्र ओझा, नीलिमा मिश्रा, कुमार जगदली, राजेश जैन ‘राही’, लतिका भावे, डॉ. सीमा निगम, नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा, डॉ. कमल साहू, डॉ. मंजुला साहू, दिलीप टिकरिहा, माधुरी कर एवं शशांक खरे सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में संयोजक गणेशदत्त झा ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों एवं उपस्थितजनों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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