बेसहारों के आश्रय पर मुनाफाखोरी का आरोप, तिल्दा-नेवरा में बढ़ा जनाक्रोश

सौरभ यादव/ 36 गढ़ न्यूज़ अपडेट
तिल्दा-नेवरा में गरीब और बेसहारा लोगों के लिए बनाई गई दीनदयाल अंत्योदय आश्रय योजना अब गंभीर विवादों के घेरे में आ गई है। शासन द्वारा दीनदयाल उपाध्याय चौक में निर्मित आश्रय प्रतिक्षालय का उद्देश्य जरूरतमंद राहगीरों को रात्रि विश्राम और सुरक्षित ठहराव की सुविधा देना था, लेकिन अब इसी जनहितकारी योजना पर मुनाफाखोरी, निजी कब्जे और नियमों की अनदेखी जैसे गंभीर आरोप लग रहे हैं
जानकारी के अनुसार नगर पालिका द्वारा उक्त प्रतिक्षालय को कथित तौर पर एक सब्जी व्यवसायी को लगभग 21 हजार रुपये मासिक किराये पर सौंप दिया गया है। आरोप यह भी है कि पूरे आश्रय गृह की चाबी तक निजी व्यक्ति को दे दी गई, जिससे शासन की मूल मंशा पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। मामला सामने आने के बाद नगरवासियों में भारी आक्रोश व्याप्त है और लोग इसे गरीबों और बेसहारा लोगों के अधिकारों पर सीधा हमला बता रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जिस भवन में जरूरतमंद लोग रात बिताने वाले थे, वह अब कथित रूप से निजी कब्जे और व्यावसायिक उपयोग की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है। लोगों ने नगर पालिका प्रशासन पर नियमों को दरकिनार कर मनमानी करने का आरोप लगाया है। साथ ही नगर में भूमाफियाओं की सक्रियता और उनसे कथित सांठगांठ को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं
नगरवासियों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर गरीबों के नाम पर बनी सरकारी सुविधा को निजी हाथों में सौंपने की जरूरत क्यों पड़ी क्या शासन की योजनाएं अब जरूरतमंदों के लिए कम और कमाई के लिए ज्यादा इस्तेमाल हो रही हैं
जनता के बीच यह चर्चा भी तेज है कि नगर पालिका के प्रभाव में प्रशासनिक फैसले लिए जा रहे हैं, जिसके चलते भ्रष्टाचार को खुला संरक्षण मिलता दिखाई दे रहा है। लोगों का आरोप है कि कई गंभीर शिकायतों और चर्चाओं के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आना बड़े राजनीतिक संरक्षण की ओर संकेत करता है।
*स्थानीय लोगों का कहना है —*
“अगर गरीबों के आश्रय पर भी किराये और कब्जे का खेल होगा, तो फिर जनहित योजनाओं का मतलब क्या रह जाएगा
मामले को लेकर नगर में आक्रोश लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। कई लोग इसे सिर्फ एक आश्रय गृह का मामला नहीं, बल्कि गरीबों के हक, प्रशासनिक पारदर्शिता और जनहित योजनाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा बड़ा मुद्दा मान रहे हैं।
अब देखना यह होगा कि शासन गरीबों के आश्रय पर लगे इस कथित “कब्जे” को हटाकर व्यवस्था सुधारता है या फिर जनहित की यह योजना भी राजनीतिक संरक्षण, निजी हित और मुनाफाखोरी की भेंट चढ़ती रहेगी।


