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कविता हृदय और गद्य तर्क और विचार की भाषा है : राजकुमार धर द्विवेदी

 

 

प्रस्तुतकर्ता: लक्ष्मीनारायण लहरे

36 गढ़ न्यूज अपडेट,,,रायपुर । दूरदर्शन रायपुर ने सुप्रसिद्ध साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार श्री राजकुमार धर द्विवेदी का अपने ‘कलम कल्पना’ जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम के लिए 26 मिनट की लंबी अवधि का साक्षात्कार लिया। श्री द्विवेदी से बात की वरिष्ठ पत्रकार श्री शशांक खरे जी ने। इस दौरान श्री द्विवेदी ने अपनी लोकप्रिय कविताएं भी सुनाईं। इस कार्यक्रम के निर्माता दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी श्री बालकृष्ण श्रीवास्तव हैं। इस कार्यक्रम का प्रसारण 12 अप्रैल को शाम साढ़े चार बजे दूरदर्शन, रायपुर से होगा। साक्षात्कार के प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं।

 

प्रश्न : द्विवेदी साहब, सबसे पहले आप अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि, शिक्षा-दीक्षा पर प्रकाश डालेंगे।

उत्तर: मेरा जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ, जहां अनुशासन और राष्ट्रवाद की जड़ें बहुत गहरी थीं। मेरे पिता जी सेना में थे और उनके द्वारा सुनाई गई वीरता की कहानियों ने ही मेरे भीतर ‘ओज’ का संचार किया। मेरी माता जी ने उन कहानियों को लोक-संस्कारों में ढाला। मेरी प्रारंभिक शिक्षा गांव के शांत और प्राकृतिक परिवेश में हुई, जिसने मेरी संवेदनाओं को जगाया। बाद में उच्च शिक्षा के लिए मैं रीवा आया, जहां अकादमिक और साहित्यिक परिवेश ने मुझे एक नया विस्तार दिया।

 

प्रश्न : चूंकि आप पत्रकार भी हैं, कवि भी हैं, गद्य लेखन में भी माहिर हैं, आप वास्तव में हैं क्या?

उत्तर: शशांक जी, मूलतः तो मैं एक ‘जिज्ञासु’ हूं, जो समाज को अपनी आंखों से देखता है और हृदय से महसूस करता है। जब वह अनुभव भावुकता की पराकाष्ठा पर पहुंचता है तो ‘कविता’ बन जाता है। जब वह तथ्यों और सामाजिक विसंगतियों से टकराता है तो ‘पत्रकारिता’ का रूप ले लेता है। और जब किसी विचार को विस्तार से समाज तक पहुंचाना हो तो मैं ‘गद्य’ का सहारा लेता हूं। मैं खुद को शब्दों का एक ऐसा साधक मानता हूं, जो समय के साथ अपनी विधा बदलता रहता है।

कविता :

 

प्रश्न : आपने लेखन कर्म की शुरुआत कब से और कैसे की?

उत्तर: जैसा कि मैंने पहले भी साझा किया, इसकी शुरुआत बचपन के घरेलू परिवेश से ही हो गई थी। विद्यालय में छोटी-छोटी कविताएं पढ़ना और साथियों की सराहना पाना प्रेरणा बना लेकिन औपचारिक शुरुआत 1985 में ‘आकाशवाणी रीवा’ से हुई। 1986 से मेरी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं। ‘एक कली मधुमास की’ और ‘बिना मुखौटे का आदमी’ जैसी पुस्तकों के माध्यम से यह यात्रा आज तक अनवरत जारी है।

 

प्रश्न : आप गद्य भी लिखते हैं और पद्य भी, दोनों लेखन में तालमेल कैसे बिठाते हैं?

उत्तर: गद्य और पद्य मेरे लिए एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पद्य (कविता) संवेगों और हृदय की भाषा है—जो कम शब्दों में बहुत कुछ कह देती है। वहीं गद्य (लेख/कहानी) मस्तिष्क और तर्क की भाषा है। जब मुझे सामाजिक बुराइयों पर सीधा प्रहार करना होता है या कोई ऐतिहासिक तथ्य रखना होता है तो गद्य काम आता है। तालमेल बिठाना कठिन नहीं होता, क्योंकि विषय खुद तय कर लेता है कि उसे किस विधा में ढलना है।

कविता :

 

प्रश्न : द्विवेदी साहब, आपकी लेखनी की मूल विधा क्या है, चूंकि आप बघेलखंड के हैं तो आपकी रचनाओं में आंचलिकता का कितना असर पड़ा है?

उत्तर: मेरी जड़ें बगीलखंड की माटी में हैं और वर्तमान छत्तीसगढ़ की ऊर्जा में। आंचलिकता साहित्य की खुशबू होती है। बघेलखंडी लोक-जीवन की सादगी, वहां की वीरता और लोक-मुहावरे अनायास ही मेरी रचनाओं में आ जाते हैं। मेरा मानना है कि साहित्य जितना अपनी जड़ों से जुड़ा होगा, उतना ही वह वैश्विक और सार्वभौमिक होगा।

कविता :

 

प्रश्न : साहित्य समाज का दर्पण है। समय के सापेक्ष साहित्य समाज के कितना करीब है?

उत्तर: साहित्य केवल दर्पण नहीं है, जो केवल चेहरा दिखाए, उसे ‘दीपक’ भी होना चाहिए, जो राह दिखाए। आज के दौर में साहित्य समाज के बहुत करीब है। आज का साहित्यकार केवल कल्पनालोक में नहीं जीता, वह आम आदमी की रोटी, बेरोजगारी, रिश्तों के टूटने और तकनीकी मशीनीकरण के दर्द को लिख रहा है। जब तक साहित्य आम आदमी की पीड़ा की बात करेगा, वह समाज के करीब बना रहेगा।

कविता:

 

प्रश्न : द्विवेदी साहब, क्या युवा पीढ़ी साहित्य से तिरोहित (दूर) होती जा रही है?

उत्तर: यह कहना आंशिक रूप से सही हो सकता है कि वे ‘किताबों’ से दूर हुए हैं, लेकिन ‘साहित्य’ से नहीं। आज का युवा किंडल, सोशल मीडिया और पॉडकास्ट के माध्यम से साहित्य का उपभोग कर रहा है। हां, हमें चिंता इस बात की करनी चाहिए कि वे क्या पढ़ रहे हैं। अगर हम उन्हें आधुनिक माध्यमों में अच्छा और सुरुचिपूर्ण साहित्य उपलब्ध कराएंगे, तो वे कभी इससे विमुख नहीं होंगे।

 

प्रश्न : युवा छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी साहित्य की क्या संभावनाएं देखते हैं?

उत्तर: छत्तीसगढ़ी साहित्य का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। यहां की लोक-कला, करमा-ददरिया और यहां के त्योहारों में अद्भुत काव्य है। नए रचनाकार अब अपनी भाषा को गर्व के साथ अपना रहे हैं। छत्तीसगढ़ी केवल बोली नहीं, बल्कि एक समृद्ध सांस्कृतिक चेतना है। शासन और समाज के प्रोत्साहन से यह राष्ट्रीय पटल पर अपनी और भी सशक्त पहचान बनाएगी।

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प्रश्न : सोशल मीडिया के आने के बाद तब और अब के साहित्य में आपने क्या बदलाव देखा है?

उत्तर: सोशल मीडिया ने साहित्य को ‘लोकतांत्रिक’ बना दिया है। पहले संपादकों की लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती थी, अब आप सीधे पाठक से जुड़ सकते हैं। लेकिन इसका एक नकारात्मक पक्ष भी है—जल्दबाजी और सतहीपन। पहले साहित्य ‘साधना’ थी, अब कई बार वह ‘प्रचार’ बन जाता है। फिर भी, अच्छी रचना अपनी जगह खुद बना लेती है, चाहे वह कागज पर हो या स्क्रीन पर।

 

प्रश्न : द्विवेदी साहब, आपको मिले पुरस्कारों का उल्लेख करेंगे?

उत्तर: पुरस्कार एक रचनाकार की जिम्मेदारी बढ़ा देते हैं। मुझे विभिन्न साहित्यिक मंचों और संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है, लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार वह पाठक है, जो मेरी कविता सुनकर कहता है कि यह तो मेरे मन की बात है।

कविता :

 

प्रश्न : द्विवेदी साहब, समाज को क्या संदेश देना चाहेंगे?

उत्तर: मेरा संदेश सरल है—’संवेदना बचाए रखिए’। तकनीक के इस युग में हम मशीन न बन जाएं। अपनों से मिलें, बड़ों का सम्मान करें और राष्ट्र के प्रति अपने छोटे-छोटे कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें। जैसा कि मेरे शिक्षक ने कहा था—रास्ते से पत्थर हटा देना भी राष्ट्र-सेवा है। बस इसी सेवा भाव को अपने भीतर जीवित रखें।

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