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दो बुजुर्ग, दो प्रेरणाएं: कर्मयोग और स्वाभिमान की जीवंत मिसाल”

“Two Elders, Two Inspirations: Living Examples of Dedication and Self-Respect”

 

 

 

 

 

 

 

 

36गढ़ न्यूज अपडेट,,,रायपुर।वक्त के साथ कई यादें धुंधली हो जाती हैं, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो अपनी जीवनशैली और मूल्यों के कारण हमेशा के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार धर द्विवेदी ने अपने संस्मरण में ऐसे ही दो बुजुर्गों को याद किया है, जिनका जीवन आज की पीढ़ी के लिए मिसाल है।

पहले व्यक्तित्व हैं श्री नंदकिशोर शुक्ल, जिन्होंने लगभग सौ वर्षों का सार्थक जीवन जिया। वे न केवल खुशमिजाज स्वभाव के थे, बल्कि गांव की सामाजिक एकता के केंद्र भी थे। किसी भी सामाजिक आयोजन या विवाद में उनकी भूमिका अहम रहती थी। उम्र के अंतिम पड़ाव में भी उनका कर्मयोग जारी रहा। 90 वर्ष की आयु पार करने के बाद भी वे घर की मरम्मत कार्य में सक्रिय रूप से हिस्सा लेते नजर आए, जो उनकी अदम्य ऊर्जा और जीवटता को दर्शाता है। उनका मानना था कि सक्रिय रहना और प्रेम बांटना ही दीर्घायु का सबसे बड़ा रहस्य है।

दूसरे व्यक्तित्व प्रेस जगत के एक अनुभवी ‘मशीन मैन’ थे, जिन्हें लोग सम्मान से ‘बाबा’ कहकर पुकारते थे। अपने काम के प्रति उनका समर्पण और हुनर अद्वितीय था। एक घटना में, जब उन्हें अपने मालिक की डांट का सामना करना पड़ा, तब भी उनका आत्मविश्वास अडिग रहा। उन्होंने गर्व से कहा कि उनके काम की कोई कमी नहीं है और वे कहीं भी जाकर अपने हुनर से पहचान बना सकते हैं। उनका यह स्वाभिमान और आत्मविश्वास आज के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

हालांकि आज ये दोनों बुजुर्ग हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका जीवन संदेश आज भी जीवित है। एक ओर जहां नंदकिशोर शुक्ल का सामाजिक सेवा और श्रम के प्रति समर्पण प्रेरित करता है, वहीं ‘बाबा’ का अपने हुनर पर अटूट विश्वास आत्मनिर्भरता का संदेश देता है।

आज के दौर में, जब लोग छोटी-छोटी चुनौतियों में हार मान लेते हैं, ऐसे में इन दोनों व्यक्तित्वों की जीवटता और सकारात्मक सोच यह सिखाती है कि सच्चा उत्साह ही जीवन को अमर बना देता है।

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