रेडियो श्रोता दिवस: श्रोताओं के समर्पण और सम्मान का दिन
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रायपुर। 19/08/2026
रेडियो प्रसारण की दुनिया में श्रोताओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। कार्यक्रमों को लोकप्रिय बनाने से लेकर प्रसारण की गुणवत्ता और स्वरूप को दिशा देने तक श्रोताओं के सुझाव और सहभागिता रेडियो की ताकत रहे हैं। इसी भावना को सम्मान देने के उद्देश्य से हर वर्ष 20 अगस्त को रेडियो श्रोता दिवस मनाया जाता है।
भारत में रेडियो प्रसारण के शुरुआती दौर से ही श्रोताओं में रेडियो कार्यक्रमों को लेकर विशेष उत्सुकता रही। 20 अगस्त 1921 को पहली बार भारत में श्रोताओं के पत्र रेडियो पर प्रसारित किए जाने की ऐतिहासिक घटना का उल्लेख मिलता है। इसी दिन की स्मृति में छत्तीसगढ़ के रेडियो श्रोताओं ने वर्ष 2006 से 20 अगस्त को ‘श्रोता दिवस’ के रूप में मनाने की परंपरा शुरू की।
श्रोताओं के बिना रेडियो की प्रासंगिकता अधूरी
आकाशवाणी रायपुर के वरिष्ठ उद्घोषक प्रकाश उदय बताते हैं कि करीब दो दशक पहले आकाशवाणी सागर में पदस्थ रहते हुए उन्हें डॉक्टर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में ‘वर्तमान संदर्भ में रेडियो की प्रासंगिकता’ विषय पर शोध पत्र प्रस्तुत करने का अवसर मिला था। उस समय विश्व रेडियो दिवस की शुरुआत नहीं हुई थी, लेकिन रेडियो श्रोता दिवस की अवधारणा उनके जेहन में थी।
उनका मानना है कि श्रोताओं की सक्रिय भागीदारी के बिना रेडियो की प्रासंगिकता अधूरी है। टेलीविजन और निजी चैनलों के बढ़ते प्रभाव के दौर में रेडियो के भविष्य को लेकर चिंताएं जरूर सामने आईं, लेकिन प्रसारण तकनीक में बदलाव ने रेडियो को नई मजबूती दी।
एफएम ने बदली रेडियो की दुनिया
मीडियम वेव और शॉर्ट वेव के दौर के बाद एफएम तकनीक के आगमन ने रेडियो प्रसारण में बड़ा बदलाव किया। बेहतर ध्वनि गुणवत्ता और नए प्रस्तुति प्रारूपों ने श्रोताओं को फिर से रेडियो से जोड़ा। हालांकि एफएम का प्रसारण क्षेत्र सीमित रहा, लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले प्रसारण ने इसकी लोकप्रियता को बढ़ाया।
वर्तमान समय में रेडियो प्रसारण भी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एफएम प्रसारण को प्राथमिकता मिलने के साथ कार्यक्रमों के स्वरूप और प्रस्तुति में भी परिवर्तन दिखाई दे रहा है। श्रोताओं की मांग और सुझावों के आधार पर कार्यक्रमों को तैयार करना रेडियो की परंपरा रही है।
आम आदमी से रेडियो का सीधा जुड़ाव
रेडियो की सबसे बड़ी ताकत उसका व्यापक श्रोतावर्ग है। गांवों में रहने वाले लोग, खेत-खलिहानों में काम करने वाले किसान, रिक्शा-ठेला चालक, फैक्ट्री और कारखानों में काम करने वाले श्रमिक, बस और ट्रक चालक, दूरस्थ क्षेत्रों में कार्यरत समाजसेवी, विद्यार्थी और शिक्षक—समाज के विभिन्न वर्गों का रेडियो से सीधा जुड़ाव रहा है।
आकाशवाणी ने अपनी सरल भाषा, शालीन प्रस्तुति और स्थानीय सरोकारों को कार्यक्रमों में स्थान देकर एक मजबूत श्रोतावर्ग तैयार किया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय भाषाओं और बोलियों में प्रसारण इसकी खास पहचान है।
छत्तीसगढ़ी प्रसारण ने बनाई अलग पहचान
आकाशवाणी रायपुर से छत्तीसगढ़ी भाषा में होने वाला प्रसारण स्थानीय श्रोताओं के बीच खासा लोकप्रिय है। इसी तरह देश के अलग-अलग आकाशवाणी केंद्रों से क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों में कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। इससे रेडियो स्थानीय संस्कृति, भाषा और जनजीवन से सीधे जुड़ा रहता है।
बदलते समय में नई चुनौतियां
हालांकि रेडियो के सामने आज कई चुनौतियां भी हैं। इंटरनेट, सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और मनोरंजन के नए माध्यमों ने लोगों की सूचना और मनोरंजन की आदतों को तेजी से बदला है। ऐसे में लंबे समय तक चलने वाले पारंपरिक कार्यक्रमों के साथ-साथ कम समय में अधिक जानकारी देने वाले नए प्रारूपों की जरूरत महसूस की जा रही है।
नाटक, रूपक, परिचर्चा, भेंटवार्ता और परिसंवाद जैसे पारंपरिक कार्यक्रम आज भी रेडियो की पहचान हैं, लेकिन बदलते दौर में इनकी प्रस्तुति और अवधि को लेकर नए प्रयोग जरूरी हैं। श्रोता अब कम समय में अधिक जानकारी चाहते हैं और इसके लिए इंटरनेट जैसे माध्यम उनके पास उपलब्ध हैं।
श्रोताओं के सुझावों को मिले प्राथमिकता
रेडियो को बदलती तकनीक और डिजिटल दौर के साथ कदमताल करने के लिए कार्यक्रमों की नियमित समीक्षा और नए प्रारूपों को अपनाने की आवश्यकता है। दुनिया भर में रेडियो के पारंपरिक स्वरूपों में नवाचार किए जा रहे हैं और इससे प्रतिस्पर्धा के बावजूद रेडियो की लोकप्रियता बनी हुई है।
रेडियो की पहुंच और प्रभाव को बनाए रखने के लिए श्रोताओं की पसंद, सुझाव और बदलती जरूरतों को समझना जरूरी है। श्रोताओं को साथ लेकर किए गए बदलाव ही रेडियो को भविष्य की पीढ़ियों से जोड़ सकते हैं।
रेडियो श्रोता दिवस इसी आत्मीय रिश्ते को याद करने और रेडियो के प्रति श्रोताओं के समर्पण एवं सम्मान को रेखांकित करने का अवसर है।
— प्रकाश उदय
वरिष्ठ उद्घोषक, आकाशवाणी रायपुर (छत्तीसगढ़)


