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मनरेगा की डबरी बनी समृद्धि की राह, जयलाल बैसाखु ने रचा आत्मनिर्भरता का नया मॉडल



36garhnewsupdate.comबेमेतरा, 17 मई 2026।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत निर्मित एक डबरी ने ग्राम पंचायत हसदा के किसान  जयलाल बैसाखु की जिंदगी बदल दी है। जनपद पंचायत बेरला अंतर्गत रहने वाले जयलाल ने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद मेहनत, नवाचार और योजनाओं के समुचित उपयोग से आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है। आज वे एकीकृत कृषि मॉडल अपनाकर सालाना लगभग 4.70 लाख रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं और क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।

करीब 2 एकड़ ऊंचाई वाली भूमि होने के कारण जयलाल के खेतों में वर्षा का पानी टिक नहीं पाता था। परिणामस्वरूप खरीफ सीजन में भी धान की फसल मुश्किल से तैयार होती थी और परिवार का भरण-पोषण चुनौती बना हुआ था। इसी दौरान उन्हें ग्राम रोजगार सहायक के माध्यम से मनरेगा अंतर्गत “निजी भूमि पर डबरी निर्माण” योजना की जानकारी मिली। आवेदन के बाद तकनीकी परीक्षण कर उनके खेत में डबरी निर्माण को स्वीकृति प्रदान की गई।

मनरेगा के तहत डबरी निर्माण कार्य शुरू हुआ, जिसमें स्वयं जयलाल और उनके परिवार के सदस्यों ने श्रमिक के रूप में कार्य किया। इससे उन्हें मजदूरी भी प्राप्त हुई और खेत में लगभग 10 फीट गहरी डबरी तैयार हो गई। बारिश में डबरी पानी से भर गई और यही जलस्रोत उनके जीवन में बदलाव का आधार बना।

पानी उपलब्ध होने के बाद जयलाल ने पारंपरिक खेती के बजाय “इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल” अपनाया। उन्होंने डबरी में रोहू, कतला और मृगल मछलियों का पालन शुरू किया। पहली ही खेप में लगभग 12 क्विंटल मछली उत्पादन हुआ, जिससे उन्हें अच्छी आय प्राप्त हुई। इसके साथ ही उन्होंने बत्तख पालन भी शुरू किया। बत्तखों का मल मछलियों के लिए प्राकृतिक आहार बनने लगा, जिससे उत्पादन लागत में कमी आई और अतिरिक्त आय का स्रोत भी तैयार हुआ।

जयलाल ने डबरी की मेड़ों को चौड़ा कर वहां 200 देशी एवं कड़कनाथ मुर्गियों के पालन के लिए शेड भी बनाया। मुर्गियों की बीट डबरी में गिरकर मछलियों के लिए पोषण का कार्य करती है, वहीं खेतों और सब्जियों के लिए जैविक खाद के रूप में उपयोग हो रही है। इस समन्वित मॉडल ने खेती, मत्स्य पालन और पशुपालन को एक साथ जोड़कर आय के कई स्थायी स्रोत विकसित कर दिए हैं।

डबरी के पानी से अब जयलाल वर्षभर खेती कर रहे हैं। पहले जहां केवल एक फसल लेना संभव था, वहीं अब धान, गेहूं और मौसमी सब्जियों सहित तीन फसलें ली जा रही हैं। इससे उनकी आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है।

अपनी सफलता पर जयलाल बैसाखु कहते हैं,

> “पहले सालभर में 50 हजार रुपये कमाना भी मुश्किल था। मनरेगा से बनी डबरी ने मेरी जिंदगी बदल दी। अब मैं आत्मनिर्भर हूं और दूसरे लोगों को भी रोजगार दे पा रहा हूं। मेहनत और सही योजना पर भरोसा करने से सब संभव है।”

जयलाल का यह मॉडल जिले में जल संरक्षण आधारित कृषि और ग्रामीण आजीविका का सफल उदाहरण बनकर उभरा है। मनरेगा, मत्स्य पालन एवं पशुपालन विभाग के अभिसरण से विकसित यह पहल किसानों की आय बढ़ाने में प्रभावी साबित हो रही है। जयलाल बैसाखु की सफलता इस बात का प्रमाण है कि जल संरक्षण और संसाधनों के बेहतर उपयोग से बंजर भूमि को भी समृद्धि का आधार बनाया जा सकता है।

उनका संदेश अब गांव-गांव में प्रेरणा बन रहा है…
“पानी रोक लो, पैसा खुद-ब-खुद आएगा।”

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