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आस्था और परंपरा का संगम, नगर से गांव तक श्रद्धा से मनी वट सावित्री पूजा




वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मी नारायण लहरे


36garhnewsupdate.com|सारंगढ़ । सुहागिन महिलाओं के अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु की कामना का पर्व वट सावित्री पूजा इस बार भी सारंगढ़ बिलाईगढ़ जिले में पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाई गई।
नगर से लेकर सुदूर गांवों तक वट वृक्षों के नीचे महिलाओं की भीड़ रही। मंत्रोच्चार, लोकगीतों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच महिलाओं ने वट वृक्ष की परिक्रमा कर पूजा-अर्चना की।
सारंगढ़ जिला मुख्यालय सहित कोसीर गांव में दोपहर के समय वट सावित्री पूजा का मुख्य अनुष्ठान संपन्न हुआ। यहां सैकड़ों महिलाओं ने बरगद के पेड़ के नीचे एकत्र होकर पूजा अर्चना की। सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी और पति की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना की। पूरे क्षेत्र में सुबह से ही बाजारों में पूजा सामग्री, मौली, सूत, फल-फूल और श्रृंगार की वस्तुओं की रौनक दिखी।

*वट सावित्री पूजा का महत्व*



हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है। ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाए जाने वाले इस व्रत की मान्यता पौराणिक कथा सावित्री और सत्यवान से जुड़ी है। मान्यता है कि सावित्री ने अपने पति सत्यवान को यमराज के चंगुल से वापस लाकर पतिव्रता धर्म की शक्ति का परिचय दिया था। तभी से महिलाएं इस दिन व्रत रखकर वट वृक्ष की पूजा करती हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार वट वृक्ष में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है। वट वृक्ष की पूजा करने से सुख, समृद्धि, संतान सुख और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत न केवल पति की लंबी उम्र के लिए किया जाता है, बल्कि यह नारी शक्ति, धैर्य और समर्पण का भी प्रतीक है।



*सारंगढ़ जिले में दिखा उत्साह*

सारंगढ़ नगर के प्रमुख मंदिरों और कोसीर गांव के जीवन दायिनी बांधा तालाब के वट वृक्षों के आसपास सुबह 6 बजे से ही महिलाओं का आना शुरू हो गया था। पारंपरिक लाल-सफेद साड़ी, चूड़ी और सिंदूर से सजी महिलाओं ने वट वृक्ष को कच्चे सूत से 108 बार बांधकर परिक्रमा की। इस दौरान महिलाएं सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती रहीं और लोकगीत गाकर माहौल को भक्तिमय बना दिया।

सारंगढ़ से लगभग 16 किमी दूर कोसीर गांव में दोपहर 12 बजे पूजा का आयोजन हुआ। यहां  गांव स्थानीय समिति वो महिलाओं ने मिलकर वट वृक्ष के नीचे साफ-सफाई और बैठने की व्यवस्था की थी। गांव की बुजुर्ग महिलाओं ने नई बहुओं को व्रत और पूजा की विधि बताई। कोसीर गांव की व्रती महिलाओं ने कहा यह व्रत हमारी परंपरा है। हम अपनी माँ-दादी से सीखकर हर साल यह पूजा करती हैं। इससे मन को शांति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि आती है।”

*गांव-गांव तक पहुंची आस्था*

केवल कोसीर ही नहीं, बल्कि सारंगढ़ जिले के  गांवों में भी वट सावित्री पूजा को लेकर खासा उत्साह देखा गया। कई जगहों पर महिला मंडलियों ने सामूहिक पूजा का आयोजन किया। ग्रामीण क्षेत्रों में इस दिन महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर, बिंदी और सुहाग की सामग्री देकर सौभाग्य की कामना की।

वट सावित्री पूजा प्रकृति और संस्कृति को जोड़ने वाला पर्व है। बरगद का पेड़ पर्यावरण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसकी लंबी उम्र और छाया हमें यह संदेश देती है कि परिवार और समाज को भी उसी तरह मजबूत और संरक्षित रखना चाहिए।

*सामाजिक संदेश*

आज जब आधुनिकता के दौर में कई परंपराएं धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं, वट सावित्री जैसी पूजा सामाजिक एकता और नारी शक्ति को जीवित रखे हुए है। इस दिन महिलाएं न केवल धार्मिक अनुष्ठान करती हैं, बल्कि आपसी मेलजोल और सहयोग का भी संदेश देती हैं।

पूजा के समापन पर महिलाओं ने वट वृक्ष से प्रसाद लेकर अपने पति और परिवार में बांटा।
कोसीर में एक दूसरे को सुहागिनें बधाई दी और प्रसाद बांटे

इस तरह सारंगढ़ जिले में वट सावित्री पूजा ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि आस्था की जड़ें गांव-गांव तक कितनी गहरी हैं। नगर की चकाचौंध हो या गांव की सादगी, इस पर्व पर हर जगह एक ही भाव दिखा – पति की लंबी उम्र और परिवार की सुख-शांति की कामना करते हुए पूजा अर्चना किए ।

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