रायगढ़ में जैविक खेती को नई दिशा: नील हरित शैवाल से बढ़ेगी मिट्टी की उर्वरता, घटेगी यूरिया पर निर्भरता


36garhnewsupdate.comरायगढ़। जिले में जैविक खेती को प्रोत्साहित करने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से जिला प्रशासन ने एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। आगामी खरीफ सीजन को ध्यान में रखते हुए नील हरित शैवाल (ब्लू ग्रीन एल्गी) के बड़े पैमाने पर उत्पादन एवं उपयोग की कार्ययोजना पर तेजी से अमल किया जा रहा है।
यह जैविक तकनीक मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, फसल उत्पादन सुधारने तथा खेती की लागत कम करने में सहायक सिद्ध होगी। राज्य शासन के निर्देश एवं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की मंशानुरूप कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी के मार्गदर्शन में यह अभियान विभिन्न विभागों के समन्वय से संचालित किया जा रहा है।
95 गौठानों में होगा बड़े पैमाने पर उत्पादन
जिले के 95 चयनित गौठानों के 309 टांकों में नील हरित शैवाल का उत्पादन किया जाएगा। इसके लिए 463.50 किलोग्राम मदर कल्चर का उपयोग किया जाएगा, जिससे लगभग 7725 क्विंटल उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस उत्पादन से 772.5 हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक उपयोग संभव होगा तथा लगभग 38.18 मीट्रिक टन यूरिया की खपत में कमी आने का अनुमान है।
515 किसानों को मिलेगा सीधा लाभ
जिले के 515 प्रगतिशील किसानों को उनके स्वयं के टांकों में नील हरित शैवाल उत्पादन के लिए चयनित किया गया है। इन किसानों के माध्यम से 515 टांकों में उत्पादन किया जाएगा, जिसके लिए 257.50 किलोग्राम मदर कल्चर उपलब्ध कराया जाएगा। इससे लगभग 10,300 क्विंटल उत्पादन संभावित है, जिसका उपयोग 1030 हेक्टेयर क्षेत्र में किया जाएगा तथा करीब 50.88 मीट्रिक टन यूरिया की बचत संभव है।
प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान जारी
कृषि विभाग, एनआरएलएम एवं कृषि मित्रों के माध्यम से गांव-गांव किसानों को नील हरित शैवाल के उत्पादन, उपयोग और लाभों की जानकारी दी जा रही है। साथ ही मैदानी अमलों को विशेष प्रशिक्षण देकर तकनीकी रूप से सशक्त किया जा रहा है।
क्या है नील हरित शैवाल?
नील हरित शैवाल एक प्राकृतिक सूक्ष्मजीव है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को अवशोषित कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है। इसे धान की खेती में प्राकृतिक जैव उर्वरक के रूप में उपयोग किया जाता है। कम लागत और आसान उत्पादन प्रक्रिया के कारण यह किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी तकनीक बनकर उभर रहा है।
जिला प्रशासन की यह पहल टिकाऊ खेती, कम लागत और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, जिससे किसानों को दीर्घकालिक लाभ मिलने की उम्मीद है।


