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रायपुर साहित्य सृजन संस्थान की काव्य संध्या में कवियों ने वृंदावन हॉल में कविताओं से सृजन का संदेश दिए ….

 

वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीनारायण लहरे

36gadrnewsupdetरायपुर ।साहित्य सृजन संस्थान की परशुराम जयंती पर आयोजित काव्य संध्या में कवियों की रचनाओं से पूरा रायपुर वृंदावन हॉल तालियों से गूंजता रहा।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ संजय अलंग पूर्व IAS एवं संभागायुक्त रायपुर रहे वही दिव्या पाण्डेय” शिवानी” रायगढ़ से विशिष्ठ अतिथि रहीं।सुदेश कुमार मेहर आज के कलमकार विशिष्ठ अतिथि एवं वरिष्ठ साहित्यकार राजकुमार धर द्विवेदी,पूनम ऋतु सेन,समीर गटकरी विशेष आमंत्रित स्थिति रहे। साहित्य सृजन संस्थान द्वारा आयोजित ओपन माइक प्रतियोगिता के संचालक एवं निर्णायक पूनम ऋतु सेन, पूर्वा श्रीवास्तव,राकेश अग्रवाल एवं सुदेश कुमार मेहर को स्मृति चिन्ह से सम्मानित किया गया।वही 26 प्रतिभागियों को सम्मान पत्र से भी सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में कवियों ने अपनी रचनाओं से श्रोतों की भरपूर तालियां बटोरी।वही कवियों ने आस जगाया कि यह जीवन निर्थक नहीं हैं जिंदगी में संघर्षों के साथ साथ आनंद भी है हमें जीवन के मूल्यों का पहचान करते हुए समाज के लिए साहित्य गढ़ना होगा ।साहित्य की यह सृजन अंतिम व्यक्ति की आस बने कविताएं जीवन मर्म को छूकर आनंद का अहसास कराए ।साहित्य हमें राह दिखाए कविताओं का यह आवाज दूर तलक सच का साथ रहे लोगों में विश्वास जिंदा रखे कवियों ने अपने शब्दों से कविता से माध्यम से समाज को सृजन का संदेश दिए । कवियों की कविताएं वृंदावन हॉल की नींव से अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने के लिए मचलती रही। कवियों की कविताएं जो समाज के लिए सृजित है प्रमुख रूप से कवियों की कविताएं …

राम वनवास को, संग सीता चले।

राज के ताज को, राम रीता चले।।

राम के तुम लखन,भाँति भ्राता बनो।

शस्त्र धारण करो, शास्त्र ज्ञाता बनो।।

 

रेशमी वस्त्र को, त्याग सारे चले।

मातु रोती रही, तात प्यारे चले।।

कैकई बोलती, पुत्र दाता बनो।

शस्त्र धारण करो, शास्त्र ज्ञाता बनो।।

 

-राकेश अग्रवाल

 

 

यादों को तेरी तकिया बना लिया हमने

कभी लिपटकर रोए बहुत,

कभी सिरहाने सजा लिया हमने।

कभी जी भर के बातें कीं,

कभी गले लगा लिया हमने।

_कश्विता जालान

 

सत्य-अहिंसा जीवन-दर्शन चश्मा चरखा गाँधी है

कुछ लोगों ने समझ लिया है बस इक चेहरा गांधी हैं

 

__सुदेश कुमार मेहर

 

 

ना शिकवा किसी से ना कोई गिला है

मुझे जब से मेरा वो रहबर मिला है

मैं खुद से ही खुद को मनाने लगी हूं

हाँ खुद से मोहब्बत जताने तने लगी हूं.

पूर्वा श्रीवास्तव

 

 

“कवि व साहित्यकार का जन्म”

 

अंतिम पंक्तियाँ

बस अपने भावों व विचारों को साकार करता हुआ..

नियति के आदेश से..

एक दिन संसार से विदा लेता हैं..

अपने पीछे छोड़ जाता है.

देश व समाज के लिए..

साहित्य रूपी अमूल्य धरोहर…

वह जीवित रहते हैं..

अपने लिखें. काव्य, गद्य,

से संकलित किताब मे..

चिरकाल तक..

अजर अमर..

मेरे साहित्यकार…

__दिव्या पाण्डेय” शिवानी” रायगढ़

 

 

मेरे घर के पीछे एक नदी रहती है

जो बिल्कुल पानी जैसी है

नदी इतनी लंबी है

वह कही से शुरू होकर

कही दूर तक खत्म होती है

मैने सोच

अगर नदी को मोड़कर

अपने बस्ते में रख लूं

तो क्या मछलियां मेरी किताबों के बीच तैरेगी?

और क्या भूगोल के नक्शे में

पानी के धब्बे पड़ जाएंगे

नदी चलती है पर पैर नहीं दिखते

वह शोर करती है पर उसके मुंह नहीं है

__डॉ संजय अलंग

 

 

रामभद्र, श्री जामदग्न्य, भृगुवंशी, परशुराम।

पुत्र रेणुका जमदग्नि के लाड़ले परशुराम।

कर जोड़ करूँ प्रणाम।

 

इक्कीस बार धर्म स्थापना किए हैं परशुराम।

कलयुग में कल्कि को शिक्षा देंगे परशुराम।

कर जोड़ करूँ प्रणाम।

 

-रामचन्द्र श्रीवास्तव-

 

 

स्त्री जनती जब बेटी को

माॅं से माॅं,परिचित हो जाती

*बेटी माॅं का प्रतिरूप सदृश*

*बिटिया-बिटिया माॅं है समाती*

*माॅं का आशय कौन बताए*

*कौन बताए परिभाषा*

*शब्दों,अर्थों से परे जगत में*

*माॅं सृष्टि की जननी,भाषा*

यशवंत कुमार चतुर्वेदी

 

आँखों ने मेरी दोस्तो कैसा ये मंजर देखा है,

प्यासा हूँ अंदर तक मगर मैंने समंदर देखा है ।

 

*उमेश कुमार सोनी ‘नयन’*

 

 

” शब्द ”

शब्द है जीवन, शब्द है प्राण

शब्द से ही तो बनते हैं गीत और गान

शब्दों में शक्ति है, शब्दों में प्यार

शब्दों से ही तो मिलता है सबको आधार

 

सुषमा बग्गा

 

 

बड़े बड़ों को ये शायद पता नहीं होता

किसी को मार के कोई बड़ा नहीं होता

———-

हमारे बच्चों को संगत बिगाड़ देती है

कोई भी बच्चा मिज़ाजन बुरा नहीं होता

———-

जो बेवफ़ा हैं उन्हें आप बेवफ़ा कहिये

हरेक शख़्स मगर बेवफ़ा नहीं होता

—– सुखनवार हुसैन

 

 

सुने घर में यादो के सुर से सुरभित वो गीत तुम्हीं

शौर्य गान की परंपरा तुम, वचन प्रीत की साक्ष्य तुम्हीं

साधिका बन त्रिदेव खिलाई, प्रियतमा तुम, तुम रणचंडी

 

रेणु तेजेन्द्र साहू

 

 

*अक्षय तृतीया*

बैसाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया,

अक्षय तृतीया कहलाती है,

शुभ मंगल दायक है यह तिथि,

सौभाग्य शांति ले आती है!

वंदना ठाकुर

 

 

झूले संग मन झूला करता

ऐसा भी सावन था

सादे कपड़ों में वो लड़का

मेरा मनभावन था

उसे देख हौले मुस्काती

प्रेम बहुत पावन था

संग जहाँ पर झूला करते

आंगन वृंदावन था

झूले संग मन झूला करता

ऐसा भी सावन था

 

पंखुरी

 

 

आदेश आपका शिरोधार्य,

अम्बर अवनि पर ला दूँगा।

माता की शीश की बात ही क्या,

अपनी भी शीश चढ़ा दूँगा।

 

विरेन्द्र शर्मा “अनुज”

 

 

धरा का अनमोल उपहार है नारी

माँ की ममता

बहन का प्यार

बेटी का दुलार

ऐसा है नारी का शृंगार

महिषासुर मर्दिनी तू

__राजकुमार पाण्डेय

 

 

उसके होने से मेरे घर में उजाला है बहुत,

मेरी मां ने मुझे नाजों से पाला है बहुत,

 

गिरा हूं जब भी मैं ठोकर जमाने की लगी

थाम कलाई मेरी मां ने संभाला है बहुत

 

*अमृतांशु शुक्ला, रायपुर छत्तीसगढ़*

 

 

समुद्र मंथन

लक्ष्मी जी प्रकट हुईं, ‘सुषमा’ सरोज संग,

नारायण उर बसीं, सुख चहुँओर था।

 

देवों ने अमृत पिया, असुरों को छला गया,

घूमता अर्णव वेग, छलावा कठोर था।

सुषमा प्रेम पटेल

 

 

हालात अगर, बन जाए जहर,

और अपना ही बस ना चले।

जीवन का सफर, ना जाए ठहर,

तू राम भजन कर ले।

 

-अर्चना श्रीवास्तव-

 

 

मैं मंजूषा हूं…

*गांव की साधारण सी गोरी*

*ना ज्यादा सपने ,*

*न कोई बड़ी,कहानी*

*बस दिल में एक* *छोटा सा कोना था*

*जहां उनकी निशानी थी*

मंजूषा अग्रवाल

 

 

*स्त्री जनती जब बेटी को*

*माॅं से माॅं,परिचित हो जाती*

*बेटी माॅं का प्रतिरूप सदृश*

*बिटिया-बिटिया माॅं है समाती*

*माॅं का आशय कौन बताए*

*कौन बताए परिभाषा*

*शब्दों,अर्थों से परे जगत में*

*माॅं सृष्टि की जननी,भाषा*

यशवंत कुमार चतुर्वेदी

 

 

आइए, गणपति जग-वंदन।

लंबोदर हे, गौरी नंदन।

आइए, गणपति जग-वंदन।

 

स्वागत को, तैयार खड़े हम।

साथ लिए, परिवार खड़े हम।

हे प्रभुवर हम, हाथों में ले,(२)

हार -फूल, रोली अरु चंदन।

।। राजेंद्र रायपुरी।।

 

 

शिव-शीश विराजती,नभ -धरा पाताल की,गंगा अति शोभावती,

*पुण्य की पावनी हो।*

देव-नर -नाग-मुनि, सभी के कल्याण कोकि, दुःख -दोष-पाप-ताप,

*समूल दावनी हो।*

 

कल्याणी तिवारी “कोक

 

ये जो मौसम हमारे हैं।

प्यारे सारे नज़ारे हैं।

सारे मन के दुलारे हैं।

दुनिया को लुभाए हैं।

 

अरे बड़ा मज़ा आए ये जो रंग बदले तो,

आंधी तूफान आए जब ओले बरसे तो,

 

मयूराक्षी मिश्रा

 

 

वो अपने हिस्से की खुशियाँ भी मुझ पे वार देती है,

थपकियाँ देकर ,मेरी मुश्किलों को मार देती है।

मैं जब भी टूटकर बिखरूँ, सहारा देने आ जाए,

मेरी माँ की दुआ मुझको भंवर से तार देती है।

*सीमा पाण्डेय*

 

 

कब युद्ध के बाद बुद्ध की बात होगी

कब देशों में अमनो सुकून होगा

कब गन की जगह गुलाब महकेगा

कब फिर से मासूमों की किलकारियां गूंजेगी

_डॉ.साधना कसार

 

 

किस्मत के भी खाते खुलते,मेहनत की सौगात में।

मान प्रतिष्ठा यश मिले न,लाख चाहें खैरात में।।

हर कठिनाई जीवन में एक,नई सबक सिखाते हैं।

धैर्यवान न धीरज खोते,कभी मुश्किल हालात में।।

 

*विजय कुमार कोसले*

सारंगढ़

 

 

मैं आगी हव, मैं पानी हव।

मैं धरती हव, मै आसमान हव।

तै मोला हवा म अनुभव करबे,

देख कछु करे के मन नई करही,

त झन करबे…..

फेर तै मोला सुरता करबे।

_वीरेंद्र धृतलहरे

 

पिता

“जब तक मैं तुमको समझ पाया तुम तस्वीर हो गये

पिता जी तुम सचमुच

बहुत दूर हो गये ”

 

माता और पिता का अंश उस गर्भ गृह में मिलते हैं

पिता की लेखनी कहां छिप जाती

शिशु के जन्म के बाद पिता का गर्भ काल

जब तक वो गर्व न कर सके पिता पर

 

पिता जीवन का श्रीफल है

 

डॉक्टर चन्द जैन

अंकुर

कवियों ने अपनी कविता से मंच को बांधे रखा वही श्रोताओं को अपने कविताओं के आनंद का स्वाद चखाते रहे । कार्यक्रम में हबीब खान समर बागबाहरा,विजय चंद्रवंशी,किशोर लालवानी,आशा मानव,संजय देवांगन,सूरज प्रकाश सोनी,राजेश बत्रा,गोपाल प्रसाद जोशी,सफदर अली, आर के शिवपुरी,दिलीप श्रीवास्तव, यू सुदर्शन पटनायक,नीता पटनायक,सरफराज हुसैन, एच एस ठाकुर,कंचन सहाय ने उपस्थिति दर्ज कर कार्यक्रम का आनंद लिया।कार्यक्रम का सफल संचालन उमेश कुमार सोनी”,नयन” एवं कश्विता जालान द्वारा किया गया। वहीं

एक अनोखी पहल कहें या विशेष सहयोग

साहित्य सृजन संस्थान की काव्य संध्या में दोपहर की गर्मी को देखते हुए जहां शीतल पेय की व्यवस्था एच एस ठाकुर ने की वही राजकुमार पाण्डेय द्वारा मिठाई और भाटापारा से आए श्रोता लक्ष्मण सिंह राजपूत ने मंच पर उपस्थित अतिथियों के लिए शॉल और बुके को उपलब्ध कराया अपनी जिम्मेदारी निभाए ।

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