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पर्यावरण अधिनियम को किया जा रहा तार तार । अधिकारियों पर संरक्षण का आरोप।



तिल्दा-नेवरा ।    पांवर प्लांटों में मजदूरों का शोषण और प्रदूषण अधिनियम की खुली अनदेखी आज विकास के नाम पर किए जा रहे सबसे बड़े अपराधों में से एक बन चुकी है। जिस बिजली से शहर रोशन होते हैं और उद्योग चलते हैं, उसी बिजली के उत्पादन में लगे मजदूर अंधेरे, खतरे और अन्याय की ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं। यह विडंबना नहीं, बल्कि एक सोची-समझी व्यवस्था का नतीजा है, जहाँ मुनाफ़ा सर्वोपरि है और इंसान की जान सबसे सस्ती। रायपुर जिला, तिल्दा क्षेत्र के ग्राम बिलाडी में संचालित मेसर्स अग्रवाल पांवर उद्योग में मजदुरो के शोषण का बडा मामला सामने आया है। मजदुरो को श्रम अधिनियम का खुला उल्लंघन करते हुए महज 290 रूपये की दर से मजदुरी भुगतान की जा रही है ,यही नहीं मजदुरो के शोषण पर भी गंभीर लापरवाही बरती जा रही है ,  भारी डस्ट प्रदुषण के बीच मजदुर बिना मास्क व हेलमेट के काम करने को विवश हैं , मजदुरो को किसी भी तरह से औद्योगिक अधिनियम के तहत सुविधाएं ‌नही दिया जा रहा है । इस मामले  पर  श्रमिकों ने  पत्रकारों से मुखातिब होते हुए कहा कि  संबंधित उद्योग में अधिकारी जांच के नाम पर तो आते हैं लेकिन , यहां  पर फाइल कुछ और ही बनता है । उन्होंने संबंधित अधिकारियों पर आरोप लगाया कि  नोटों के बंडल के सामने अधिकारी की खामोशी से मजदुरो का शोषण को पंख लग रहा है । 

उद्योगों में
सुरक्षा उपकरण कागज़ों में दिखाए जाते हैं, ज़मीन पर नहीं। जहरीली गैसें, उड़ती राख, भारी मशीनें और ऊँचाई पर काम—इन सबके बीच मजदूर बिना हेलमेट, मास्क और सेफ्टी बेल्ट के खपाए जा रहे हैं। हादसे होते हैं, लोग घायल होते हैं, जानें जाती है ,और प्रबंधन चुप्पी साध लेता है। मुआवज़ा, इलाज और बीमा जैसे कानूनी अधिकार मजदूरों के लिए सिर्फ़ शब्द बनकर रह गए हैं।
शोषण यहीं तक सीमित नहीं है। मजदूरों को स्थायी करने के बजाय सालों तक अस्थायी रखा जाता है ताकि वे अधिकार न माँग सकें। आवाज़ उठाने पर काम से निकालने की धमकी आम बात है। यूनियन बनाने या शिकायत करने की कोशिश करने वाले मजदूरों को ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है। यह सीधा-सीधा आधुनिक गुलामी नहीं तो और क्या है?
दूसरी ओर, प्रदूषण अधिनियम की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। नियम कहते हैं कि राख का वैज्ञानिक निपटान हो, धुएँ को फ़िल्टर किया जाए और गंदे पानी को उपचार के बाद ही छोड़ा जाए। हकीकत यह है कि राख खुले मैदानों और खेतों में उड़ती है, जहरीला पानी नालों और तालाबो , नदियों में बहाया जाता है और आसमान में ज़हर घुलता रहता है। आसपास के गाँवों में दमा, टीबी, त्वचा रोग और कैंसर जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। पीने का पानी ज़हरीला हो चुका है, खेत बंजर होते जा रहे हैं, लेकिन मुनाफ़े के आगे यह सब “कोलैटरल डैमेज” मान लिया गया है।
सबसे शर्मनाक भूमिका निगरानी तंत्र की है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, श्रम विभाग और स्थानीय प्रशासन की रिपोर्टों में सब कुछ “मानकों के अनुरूप” बताया जाता है। निरीक्षण पहले से तय होते हैं, मशीनें अस्थायी रूप से ठीक कर दी जाती हैं और काग़ज़ों में हर नियम पूरा दिखा दिया जाता है। सवाल उठता है—क्या यह लापरवाही है या मिलीभगत? जब मजदूर मरते हैं और पर्यावरण ज़हर बनता है, तब यह चुप्पी अपराध में साझेदारी बन जाती है।
बिजली ज़रूरी है, लेकिन इंसान और प्रकृति से ऊपर नहीं। अगर विकास का मतलब मजदूरों की जान लेना और पर्यावरण को बर्बाद करना है, तो ऐसे विकास पर सवाल उठना ही चाहिए। अब समय आ गया है कि पावर प्लांटों में श्रम कानूनों का सख़्ती से पालन हो, प्रदूषण अधिनियम को मज़ाक न बनने दिया जाए और दोषी प्रबंधन व अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई हो। वरना यह “विकास” एक दिन पूरे समाज को अंधेरे में धकेल देगा ।

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