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संघर्ष और लगन की मिसाल बने अजय पटेल..

 

 

36gadrnewsupdet सारंगढ़। कहते हैं कि मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है। इस कहावत को सच कर दिखाया है सारंगढ़ क्षेत्र के ग्राम किरारी के युवा अजय पटेल ने। अजय ने छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (PSC) की परीक्षा में अपने तीसरे प्रयास में प्रदेश में 34वीं रैंक हासिल कर मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) पद को सुशोभित किया है। वर्तमान में वे बरमकेला में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और उनकी यह कामयाबी क्षेत्र के हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

अनुशासित परिवेश का प्रभाव-

अजय की सफलता की नींव उनके घर में ही रखी गई थी। उनके पिता मोहन लाल पटेल माध्यमिक शाला कबारीपाली में शिक्षक हैं और माता कमला पटेल गृहिणी हैं। शिक्षा के प्रति समर्पित इस परिवार और बड़े भाई संजय पटेल (NTPC नरसिंहपुर) के मार्गदर्शन ने अजय को हमेशा अनुशासन और मेहनत के लिए प्रेरित किया।

गाँव के स्कूल से अफसर बनने का सपना-

अजय की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही आदर्श विद्या मंदिर में हुई, जिसके बाद उनका चयन जवाहर नवोदय विद्यालय, चिसदा में हुआ। स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने कोटा में रहकर तैयारी की और रायपुर से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलीकम्युनिकेशन में इंजीनियरिंग की डिग्री ली। हालांकि, मन में समाज और व्यवस्था के लिए काम करने का जज्बा था, इसलिए उन्होंने पीएससी की राह चुनी।

हार के बाद मिली बड़ी जीत-

अजय का सफर आसान नहीं था। पहले प्रयास में अति-आत्मविश्वास के कारण असफलता मिली, तो दूसरे प्रयास में रैंक पीछे रह गई। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अजय ने अपनी कमियों को सुधारा और तीसरे प्रयास में शानदार 34वीं रैंक के साथ प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना पूरा किया।

पीएससी में चयन से पूर्व उन्होंने कुछ समय तक असिस्टेंट लैब टीचर के रूप में भी कार्य किया, जो उनके जमीनी जुड़ाव को दर्शाता है।

असफलता ही पहली सीढ़ी है -जनपद सीईओ

अजय पटेल अपनी सफलता का श्रेय अपने मामा गजानंद पटेल और परिवार के सहयोग को देते हैं। युवाओं को संदेश देते हुए वे कहते हैं, “अगर लक्ष्य बड़ा है तो संघर्ष भी बड़ा होगा। असफल होने से डरें नहीं, बल्कि उससे सीखकर आगे बढ़ें। निरंतर प्रयास करने वालों की मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।”

आज अजय पटेल न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले का गौरव हैं। उनकी यह कहानी साबित करती है कि गांव के सरकारी स्कूलों और नवोदय से पढ़कर भी शिख

र तक पहुंचा जा सकता है।

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