सारंगढ़ में विकास की रफ्तार बुलेट ट्रेन जैसी हुई… तो सरकार ने ड्राइवर ही बदल दिया!*

36gadrnewsupdet सारंगढ़-बिलाईगढ़ इन दिनों एक अजीब सवाल से गूंज रहा है—“आखिर इतनी जल्दी क्या थी?” सड़क, पानी, बिजली, राशन और राजनीति के शोर के बीच जनता के मन में सिर्फ एक ही चर्चा है—जिस कलेक्टर ने जिले में विकास को फाइलों से निकालकर जमीन पर दौड़ाया, उसे अचानक इतनी हड़बड़ी में क्यों हटा दिया गया? लोग हैरान हैं। क्योंकि जिस सिस्टम में एक साधारण आवेदन महीनों तक “विचाराधीन” रहकर सरकारी अलमारियों में धूल खाता रहता है, वहां एक कलेक्टर का ट्रांसफर 24 घंटे के भीतर बिजली की गति से हो जाना अपने आप में बड़ा संकेत माना जा रहा है। अब चौराहों पर तंज गूंज रहा है— “लगता है सरकार को डर लग गया कि कहीं जनता को विकास की आदत न पड़ जाए!”
संजय कन्नौजे उन अफसरों में नहीं थे जो एसी दफ्तरों में बैठकर पॉवरपॉइंट प्रेजेंटेशन देखकर सिर हिलाएं और शाम को प्रेस नोट जारी कर दें, “निर्देश दिए गए हैं…” वे जमीन पर उतरकर काम करने वाले अधिकारी थे। स्कूलों में बच्चों के बीच बैठते थे। गांवों में बिना सूचना पहुंच जाते थे। युवाओं से खुलकर संवाद करते थे। समस्याएं सुनते ही नहीं, समाधान भी तलाशते थे। उन्होंने लोगों को यह भरोसा दिलाया कि प्रशासन सिर्फ सरकारी भवनों में बंद व्यवस्था नहीं, बल्कि जनता के बीच सांस लेने वाली व्यवस्था भी हो सकती है। शायद उनकी सबसे बड़ी “गलती” यही थी कि वे जनता के बीच लोकप्रिय हो गए और भारतीय राजनीति का एक कड़वा सच यह भी है— जनता की बढ़ती तालियां कई बार सत्ता के गलियारों में बेचैनी पैदा कर देती हैं।
सारंगढ़ जैसा जिला संभालना आसान नहीं। यहां विकास से ज्यादा राजनीतिक समीकरणों की खेती होती है। कौन किस खेमे का है… कौन किस नेता के करीब है…किसे मंच पर आगे कुर्सी मिली और कौन पीछे बैठा… इन सबके बीच प्रशासन चलाना किसी बारूदी सुरंग पर संतुलन बनाकर चलने जैसा है, लेकिन कन्नौजे ने जिस सक्रियता, संवेदनशीलता और संतुलन से काम किया, उसने उन्हें सिर्फ एक कलेक्टर नहीं, बल्कि जनता के बीच भरोसे का चेहरा बना दिया। यही वजह है कि आज लोगों का दर्द सिर्फ ट्रांसफर नहीं है। दर्द इस बात का है कि जिस अधिकारी ने जिले की धड़कन पहचान ली थी, उसे अचानक ऐसे हटा दिया गया जैसे कोई सुपरहिट फिल्म क्लाइमेक्स से पहले ही बंद कर दी गई हो।
प्रशासनिक गलियारों में भी दबी जुबान में चिंता है। क्योंकि जिन योजनाओं पर पूर्व कलेक्टर की सीधी निगरानी थी, उनका भविष्य अब अधर में दिख रहा है। हमारे सिस्टम की सच्चाई भी यही है—यहां योजनाएं नियमों से कम और अफसर की व्यक्तिगत रुचि से ज्यादा चलती हैं। अफसर बदलते ही कई सपने भी फाइलों में दम तोड़ने लगते हैं। फिलहाल सारंगढ़ की जनता सिर्फ एक सवाल का जवाब तलाश रही है— आखिर ऐसा कौन-सा “आपातकालीन प्रशासनिक तूफान” आ गया था कि जिले के सबसे चर्चित और सक्रिय कलेक्टर को इतनी जल्द हटाना जरूरी हो गया? बाकी राजनीति का पुराना सिद्धांत आज भी अक्षरशः जीवित है—“जो अधिकारी जनता के दिल में जगह बना ले…उसका ट्रांसफर शासन की सबसे तेज चलने वाली विकास योजना बन जाता है!”


