अहंकार सभी सद्गुणों को नष्ट कर देता है, इससे बचना जरूरी – श्याम सुंदर पटेल
Ego Destroys All Virtues, One Must Avoid It – Shyam Sundar Patel

बिलाईगढ। विकास खंड बिलाईगढ़ के झरनीपारा में पंचदिवसीय अखंड रामायण का आयोजन विश्व कल्याण हेतु ग्राम वासियों के द्वारा किया गया। रविवार को महा नदी क्षेत्र के प्रमुख रामायणी ग्राम बांसउरकुली निवासी भाई श्यामसुंदर पटेल ने भी कथा सुनाया। उन्होंने अपने सारगर्भित प्रवचन में कहा कि – अहंकारी व्यक्ति का पतन एक न एक दिन होकर ही रहता है। अहंकार ऐसा अवगुण है जो सारे सद्गुणों को अकेला ही खा जाता है। इसलिए व्यक्ति को किसी भी चीज का घमंड नहीं करना चाहिए । प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद गोस्वामी तुलसी दासजी विनय पत्रिका में लिखते हैं कि – हमारे मन में रहने वाला मोह ही रावण है। अहंकार ही कुंभकरण है एवं काम ही मेघनाथ है।
आगे कथा सुनाते हुए मानस प्रवक्ता भाई श्याम सुंदर पटेल ने कहा कि- जब युद्ध में आधी सेना समाप्त हुई तब रावण ने जाकर अपने भाई कुंभ करण को जगाया और लंका पुरी में चलने वाले राम रावण युद्ध के बारे में सारी जानकारी दिया । लड़ाई की जानकारी देकर अपने विजय के लिए लड़ने के लिए कुंभकरण को बोला। कुंभकरण पहले रावण को फटकारता है और कहता है कि – जगदंबा मां सीता का हरण कर अब कल्याण चाहता है , यह संभव नहीं है। रावण कुंभकरण के स्वभाव को भली प्रकार जानता था वह कहता कुछ और है और करता कुछ और है ।प्रत्येक अहंकारी व्यक्ति का यही स्वभाव होता है। घमंडी व्यक्ति कहता कुछ और है और करता कुछ और है । जैसे ही रावण ने कुंभकरण के लिए मांस और मदिरा की व्यवस्था किया तब कुंभकरण उसे खा पीकर अकेला ही युद्ध के लिए लड़ने चला गया अहंकार ही एक ऐसा अव गुण है जो सारे सद्गुणों के लिए काफी है। वानरो को न तो रावण खाता है, न ही मेघनाथ , न ही अहिरावण, न ही नारांतक खाता है । एक अकेला कुंभकरण है, जो करोड़ों करोड़ों बंदरों को खा जाता है। श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसी दास जी कुंभकरण के माध्यम से समाज के लोगों को अहंकार की भया हवता, उससे होने वाली नुकसान आदि के बारे में मार्गदर्शन किए हैं ।वे मानस में लिखते हैं कि – अर्थात कुंभकरण अकेले लड़ने गया। करोड़ों करोड़ों बानरो को पकड़- पकड़ कर खा गया। इसका तात्पर्य यह है कि – आप चाहे जितनी भी पूजा पाठ यज्ञ कथा कीर्तन कर ले यदि हमें अहंकार है तो शांति भगवत प्राप्ति से दूर ही रहेंगे। अहंकार सारे सद्गुणों को अकेला खा जाता है इस लिए हमारे भक्त कवि लिखते हैं कि- जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं। प्रेम गली अति सांकरी, तामे दुई न समाहिं। अहंकार का विनाश तो भगवान ही कर सकते हैं ।शांति की प्राप्ति यदि हम करना चाहते हैं तो हमें भगवान की भक्ति करना ही होगा । अहंकार के विनाश के बिना, शांति कभी भी हमें प्राप्त नहीं हो सकता ।भगवान श्रीराम ही कुंभ करण का वध कर वानरी सेना में शांति लाते हैं। ईश्वर कृपा से ही अहंकार का विनाश संभव है। अहंकार के विनाश होने पर व्यक्ति को चिर शांति की प्राप्ति होती है। व्यक्ति को शांति की प्राप्ति के लिए सत्संग नाम जप भगवत कथा श्रवण करते रहना चाहिए।


