SARANGARH-BILAIGARH

*उत्तररामचरित में आत्म हत्या का दुष्परिणाम*



हिन्दू दर्शन और धर्मशास्त्रों में आत्मघात को अत्यन्त निन्दनीय पाप माना गया है। यह न केवल मानवीय कर्तव्य का त्याग है, अपितु आत्मा के विरुद्ध विद्रोह भी। महाकवि भवभूति विरचित उत्तररामचरित – 4 / 9  में इस विषय पर श्लोक के माध्यम से ऋषियों के मत का उल्लेख है श्लोक के अनुसार, आत्मघातिनों को अन्धतामिस्र नामक नरक तुल्य लोक प्राप्त होता है,जो गाढ़ अन्धकार से परि पूर्ण और सूर्यप्रकाश रहित है। यह चेतावनी प्राचीन भारतीय संस्कृति की जीवन पवित्रता पर बल देती है। वेदान्त से लेकर वेदाङ्ग तक, वेद-उपनिषद् से लेकर रामायण- महाभारत तक, नीति-स्मृति से लेकर पुराण उपपुराण तक, काव्य-ग्रंथों से लेकर संहिता-शास्त्रों तक आत्मघात को महापाप घोषित किया गया है, क्यों कि – जीवन ईश्वरीय धरोहर है। आधुनिक संदर्भ में भी यह मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता से जुड़ता है। इस श्लोक का शब्दार्थ हमें नैतिकता, कर्मफल और जीवन-मूल्य की गहन समझ प्रदान करता है। महाकवि भवभूति के शब्दों में –



गाढ़े अंधकार से युक्त तथा सूर्यप्रकाश से रहित वे प्रसिद्ध लोक उनके लिए नियुक्त किए जाते हैं जो आत्मघात करने वाले होते हैं, ऐसा ऋषि लोग मानते हैं। उत्तररामचरित – 4/9  का यह श्लोक हिन्दू शास्त्रीय साहित्य की गहन नैतिक चेतावनी प्रस्तुत करता है। अन्धतामिस्र गरुड़ पुराण में वर्णित 28 नरकों में प्रधानतम है, जहाँ आत्म घातिनों को अमानुष दण्ड मिलता है। यह लोक असूर्य अर्थात् सूर्य रहित है, जो अनन्त अन्धकार का प्रतीक है। न प्रेरणा, न प्रकाश, न आशा। गरुड़ पुराण यह भी स्पष्ट कहता है कि – आत्म हत्या से प्रेतयोनि की प्राप्ति होती है, जहाँ भूख-प्यास से पीड़ित को भटकना पड़ता है। श्रीमद्भागवत महापुराण – 5/26/7,9  में भी अन्ध तामिस्र नरक का वर्णन है, जहाँ पापी यातनाओं में पड़ कर जड़ से कटे हुए वृक्ष के समान, व्यथा-वेदना के मारे अपनी सारी सुध-बुध खो बैठता है। महाकवि भवभूति जैसे महाकवियों ने रामकथा को दार्शनिक आयाम दिया है। मनुस्मृति – 5/89 के शब्दों में जिसने स्वेच्छा से आत्महत्या कर ली हो, उस को जलांजलि नहीं देनी चाहिये। मनुस्मृति आत्मघात को ब्रह्महत्या तुल्य पाप घोषित करती है।सांस्कृतिक संदर्भ में यह भारतीय दर्शन की जीवन ज्योति पर जोर देती है।

अतैव निष्कर्ष यह है कि – कुल मिलाकर उत्तर रामचरित का यह श्लोक मूलत: नैतिक शिक्षा प्रदान करता है । जीवन – मूल्य, पुनर्जन्म और मोक्षमार्ग की स्मृति कराता है। आधुनिक समाज को मानसिक संतुलन सिखाता है। यह श्लोक आत्मघात के दुष्परिणाम की अमिट चेतावनी है, जो घनघोर अंधकार , घोर नरक लोक के माध्यम से जीवन की पवित्रता स्थापित करता है। ऋषिमतानुसार यह महापाप अनन्त कष्ट का कारण बनता है। भारतीय दर्शन हमें सिखाता है कि विपत्ति में धैर्य, भक्ति, ध्यान और कर्मयोग से पार पाया जाए। आधुनिक युग में, जहाँ मानसिक स्वास्थ्य संकट बढ़ रहा है, वहाँ यह श्लोक जागरूकता का स्रोत है। हमें जीवन को ईश्वरीय धरोहर मानकर संरक्षित करना चाहिए। इस प्रकार, शास्त्रों का अनुसरण नैतिक उत्थान लाता है, महापाप से बचाता है।

*डॉ. गौतमसिंह  पटेल*  सालर , सारंगढ़ छग

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Latest