*पञ्चाक्षर मन्त्र की महिमा शिवतत्त्व की गरिमा*

भारतीय दर्शन की गहन परम्परा में मन्त्र वह दिव्य ध्वनि है जो ब्रह्माण्ड की मूल चेतना को स्पर्श करती है। इनमें सर्वोपरि है पञ्चाक्षर मन्त्र नमः शिवाय। श्री शिव महापुराण की विद्येश्वर संहिता तथा वायवीयसंहिता में भगवान शिव स्वयं इसके रहस्य का उद्घाटन करते हैं। यह मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु शिव के स्वरूप का साक्षात् अवतरण है – सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और कल्याणस्वरूप।
इसकी उत्पत्ति प्रणव ॐ से हुई, जो शिव के पञ्चमुखों से प्रकट हुआ। उत्तरवर्ती मुख से अ, पश्चिम से उ, दक्षिण से म, पूर्व से बिन्दु और मध्य से नाद। ये पाँच तत्त्व मिल कर एकाक्षरी प्रणव बने,जो शिव-शक्ति के अद्वैत का प्रतीक है। इसी प्रणव से नमः शिवाय का प्राकट्य हुआ, जो शिव के सकल स्वरूप का बोधक है।
दार्शनिक दृष्टि से यह पञ्च ब्रह्म का सूक्ष्म रूप है – न सद्योजात (सृष्टि), म वाम देव (पालन), शि अघोर (संहार), वा तत्पुरुष (तिरोभाव) और य ईशान (अनुग्रह)। ये पञ्चकृत्य ब्रह्माण्ड की गति को नियंत्रित करते हैं तथा साधक के अन्तर में शिवत्व का जागरण करते हैं। नमः शब्द अहंकार के समर्पण का सूचक है – मेरा नहीं, सब शिव का । शिवाय कल्याण के परम स्रोत की ओर इंगित करता है। इस प्रकार मन्त्र अद्वैत की अनुभूति कराता है, जहाँ साधक शिवोऽहम् का साक्षात्कार करता है। जैसे विशाल बटवृक्ष सूक्ष्म बीज में निहित रहता है, वैसे ही यह सूक्ष्म मन्त्र समस्त विद्याओं, मातृका वर्णों, त्रिपदा गायत्री और सम्पूर्ण वेदों का बीज है। करोड़ों मन्त्र इसकी शाखाएँ हैं, लेकिन मूल शक्ति इसी में निहित है। यह तीनों गुणों से अतीत, सर्वव्यापी शिव का स्वरूप है।
साहित्यिक सौन्दर्य में पञ्चाक्षर मन्त्र एक अमर काव्य है। इसका जप हृदय में शिव की मधुर ध्वनि उत्पन्न करता है, जो मानसिक कल्मष को भस्म कर शान्ति का अमृत बरसाता है। निरन्तर स्मरण से साधक शिव में लीन हो जाता है। इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं, मन निर्मल हो जाता है और परम मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यह मन्त्र भक्ति और ज्ञान का अद्भुत संगम है, जो साधक को भवसागर से पार उतारता है। आधुनिक युग की इस अशान्ति में नमः शिवाय का जप आन्तरिक क्रान्ति का सूत्र है। यह सिखाता है कि सच्चा कल्याण बाहरी उपलब्धियों में नहीं, अपितु आत्मा की शिवत्व में निहित है। शिव पुराण के अनुसार, यह समस्त मनोरथों की सिद्धि करनेवाला और श्रुतियों का शिरोमणि है। निष्कर्ष यह है कि पञ्चाक्षर मन्त्र शिव का स्वयंभू स्वरूप है। इसका निरन्तर अभ्यास साधक को उस परम शान्ति तक ले जाता है जहाँ द्वैत का भ्रम मिट जाता है और केवल शिव रह जाता है – शिव, शिव, शिव। यह मन्त्र अमर है, अनन्त है और प्रत्येक हृदय के लिए उपलब्ध है। नमः शिवाय यह ध्वनि ही शिव का साक्षात् आह्वान है। नमः शिवाय
*डॉ. गौतमसिंह पटेल* सालर सारंगढ़ छग


