ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर राष्ट्रीय विद्युत मंडल शतरंज टूर्नामेंट तक पहुँचे दुर्गा तिवारी

सारंगढ़। कहते हैं कि सीमित संसाधन प्रतिभा की राह नहीं रोक सकते—इस कथन को सार्थक किया है काकोवाताल गाँव के रहने वाले दुर्गा प्रसाद तिवारी ने। बचपन में बिजली की कमी और संसाधनों के अभाव के बावजूद शतरंज के प्रति उनके जुनून ने उन्हें आज राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिलाया है।
दुर्गा तिवारी हाल ही में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित राष्ट्रीय विद्युत मंडल कर्मचारी डिपार्टमेंटल शतरंज प्रतियोगिता में छत्तीसगढ़ की ओर से प्रतिभागी बने। ग्रामीण परिवेश से निकलकर इस उपलब्धि तक पहुँचना उनके लिए ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों और गाँवों के युवाओं के लिए भी प्रेरणास्रोत है।
दुर्गा तिवारी ने बताया कि बचपन में काओवताल गाँव में बिजली की भारी समस्या रहती थी। ऐसे में वे अक्सर अपने दादाजी और गाँव के बुज़ुर्गों की ‘आंठ’ (बैठक) में बैठकर शतरंज खेलते लोगों को देखते थे। दरी पर बिछी शतरंज की बिसात और बुज़ुर्गों की चालों को देखकर ही उन्होंने खेल की बारीकियाँ सीखीं। कई बार लालटेन की मद्धम रोशनी में दोस्तों और परिवार के साथ घंटों शतरंज खेला करते थे।
उन्होंने कहा,
“उस समय न कोई कोचिंग थी और न ही राज्य स्तर के टूर्नामेंट में खेलने का अवसर। लेकिन शतरंज के प्रति जुनून लगातार बना रहा।”
आज दुर्गा तिवारी छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं और वर्तमान में शक्ति ज़िला मुख्यालय में पदस्थ हैं। अपने आख़िरी फाइनल मुकाबले को याद करते हुए उन्होंने कहा कि हार–जीत से अधिक उनके लिए यह सफ़र मायने रखता है।
दुर्गा तिवारी की यह यात्रा दर्शाती है कि यदि लगन और मेहनत सच्ची हो, तो ग्रामीण पृष्ठभूमि और सीमित साधन भी सफलता की राह में बाधा नहीं बनते। उनकी कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो कठिन परिस्थितियों में अपने सपनों को छोटा मान लेते हैं।


