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मंगल भवन खैरझिटी में संत – चरित्र चित्रण



सारंगढ़ । जपं के ग्रापं सालर के आश्रित ग्राम खैरझिटी स्थित मंगल भवन में संत – चरित्र और नेति-नेति विषय पर व्याख्यान हुआ । इस खैरझिटी आश्रम के अध्यक्ष राधेश्याम प्रधान ने श्रीराम चरित मानस, बालकाण्ड – 144/3  का संदर्भ देते हुए बताया कि – संत गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा उध्दृत पंक्ति  नेति नेति जेहि वेद निरूपा  का अभिप्राय यह है कि सच्चिदानन्द परम ब्रह्म इन्द्रिय, बुद्धि और वाणी की पकड़ से परे है। वेद जब उस परम तत्त्व का वर्णन करते हैं  तो प्रत्येक सीमित उपमा को अस्वीकार करते हुए कहते हैं – यह भी नहीं , वह भी नहीं । इसका आशय यह कदापि नहीं कि – ब्रह्म का अस्तित्व नकारा जा रहा है। निर्विवाद रूप से इसका तात्पर्य यह है कि ईश्वर किसी एक रूप, गुण अथवा परिभाषा में बँधे नहीं हैं । संत-चरित्र इसी अनुभूति की साक्षी है कि – परम सत्य का साक्षात्कार त्याग, साधना, अन्तःकरण की शुद्धि से ही सम्भव है ।

आश्रमाचार्य चुनेश्वरसिंह वर्मा ने बताया कि – श्रीराम चरित मानस, बालकाण्ड – 226 – 231  में वर्णित प्रसंग सरस और भावपूर्ण है। प्रभात बेला में नित्यकर्म, स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर दोनों भाई अपने आराध्य संत गुरु ब्रह्मर्षि विश्वामित्रजी की चरण-वन्दना करते हैं । उपरान्त महामुनि की आज्ञा से पूजा-पाठ के निमित्त पुष्प चुनने राजबाग में पदार्पण करते हैं। तत्समय वहाँ से कंगन, करधनी एवं कर्णफूल की कर्णप्रिय ध्वनि तथा पायल की सुमधुर झंकार उनके कानों में पड़ती है । उस अलौकिक नाद को सुनकर विस्मय पूर्वक श्रीराम लक्ष्मणजी से कहते हैं कि – ऐसा प्रतीत होता है मानो कामदेव ने सम्पूर्ण विश्व को जीतने का संकल्प लेकर रणभेदी बजा दी हो । यह ध्वनि साधारण नहीं, अपितु किसी महान मंगलकारी अवसर उपलब्ध होने का सूचक है ।

आश्रम उपाध्यक्ष कुंजराम साहू द्वारा भागवत, अध्याय छः, श्लोक पाँच का पाठ करते हुए बताया गया कि – यह कृष्णादेश गहन आत्मबोध से युक्त है। गीता का यह वचन मानव को आत्मोद्धार की प्रेरणा देता है, की वह अपने प्रयासों से स्वयं को संसार – सागर से पार लगाये, अपने ही आचरण से अपने आप को अधोगति की ओर न ढकेले । आश्रम के सुप्रसिद्ध संगीत साधक श्रीसंतरामजी निषाद ने अत्यन्त कर्णप्रिय राम-भजन सुनायें । आश्रम के वयोवृद्ध कथावाचक श्रीसंतरामजी पटेल द्वारा कही गई बात गहन आत्म मंथन को आमंत्रित करती है। भगवान दत्तात्रेय ने प्रकृति के जलचर, थलचर तथा नभचर प्राणियों सहित चौबीस गुरुओं से जीवन के अमूल्य पाठ ग्रहण किए जहाँ पशु पक्षी अपने स्वभाव में सहज, मर्यादित और प्रकृति सम्मत रहते हैं, वहीं मनुष्य विद्या, बुद्धि व विवेक रहते हुए भी उसे तज देता है। दत्तत्रेयजी की यह दृष्टि मानव को दर्पण दिखाती है, कि जब तक वह अपने आचरण को शुद्ध, विनम्र और सत्यनिष्ठ नहीं बनाता, तब तक वह स्वयं किसी का गुरु बनने योग्य नहीं हो सकता । आश्रम संरक्षक योगेन्द्रकुमार पटेल ने अपने प्रवचन में भक्ति काल के दो महान संत दम्पतियों के जीवन से जुड़ी दो मार्मिक कथा वृत्तान्तों का चरित्र-चित्रण किया ।

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