रायपुर

*सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय आदिवासी अस्मिता और ‘ग्राम सरकार’ की बड़ी जीत – विकास मरकाम*



रायपुर। आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधीय पादप बोर्ड के चेयरमेन विकास मरकाम ने माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 28 अक्टूबर 2025 के निर्णय को बरकरार रखने के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने इसे बस्तर से लेकर सरगुजा तक के करोड़ों आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान, परंपरा और स्वाभिमान की महाविजय बताया है।

विकास मरकाम ने जारी बयान में कहा कि माननीय न्यायालय के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि पेसा (PESA) कानून के तहत हमारी ग्राम सभाएं केवल नाम की नहीं, बल्कि ‘स्वशासन’ की असली शक्ति रखती हैं। ग्राम सभाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और रीति-रिवाजों की रक्षा करने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है।

धर्मांतरण की साजिश कर्ताओं पर करारा प्रहार करते हुए मरकाम ने कहा कि “लंबे समय से बाहरी तत्वों और मिशनरी ताकतों द्वारा हमारे भोले-भाले आदिवासी भाई-बहनों का धर्मांतरण कराकर हमारी मूल संस्कृति को नष्ट करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा था। जब ग्राम सभाओं ने अपनी परंपरा बचाने के लिए सूचना बोर्ड लगाए, तो कुछ लोगों ने इसे असंवैधानिक बताने की कोशिश की। लेकिन आज सत्य की जीत हुई है। न्यायालय ने माना है कि अपनी संस्कृति को बचाने के लिए उठाए गए एहतियाती कदम पूरी तरह वैध हैं।”

भाजपा सरकार की प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए मरकाम ने कहा कि प्रदेश की विष्णु देव साय सरकार और देश की मोदी सरकार आदिवासियों के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ उनकी पहचान को सुरक्षित रखने के लिए संकल्पित है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जी, उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री श्री विजय शर्मा जी के मार्गदर्शन में राज्य सरकार ने न्यायालय में आदिवासियों के पक्ष को जिस मजबूती से रखा, यह उसी का परिणाम है।

मरकाम ने अंत में कहा, “यह निर्णय उन ताकतों के मुंह पर तमाचा है जो आदिवासियों को उनकी जड़ों से काटकर समाज को बांटना चाहते थे। अब छत्तीसगढ़ का आदिवासी समाज अपनी ग्राम सभाओं के माध्यम से अपनी परंपराओं का संरक्षण और संवर्धन और भी गर्व के साथ करेगा।”

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