SARANGARH-BILAIGARH

भटगांव में भरे सरकारी तालाब की जमीन पर गुप्त डील’ का सनसनी खेज आरोप



सारंगढ़ । भटगांव नपं इन दिनों एक ऐसे गंभीर और संवेदनशील विवाद के घेरे में है, जिसने नगर की सियासत से लेकर आम नागरिकों तक को झकझोर कर रख दिया है। मामला जल संसाधन विभाग के स्वामित्व वाले एक भरे हुए सरकारी तालाब से जुड़ा है, जहां कथित तौर पर व्यावसायिक दुकानों के निर्माण और जमीन की ‘बिक्री’ की तैयारी कर ली गई है। आरोप है कि यह सब कुछ बिना सार्वजनिक सूचना, बिना पारदर्शिता और बंद कमरों में करोड़ों की डील के जरिए किया जा रहा है।

भरे तालाब पर दुकान दारी नियम-कानून ताक पर

स्थानीय सूत्रों, जानकारों के अनुसार जिस तालाब की जमीन पर दुकानों का प्रस्ताव है, उसमें वर्तमान में पानी भरा हुआ है। न तो तालाब को वैधानिक रूप से निरस्त (डिनोटिफाई) किया गया है, न ही जल संरक्षण से जुड़ी प्रक्रियाओं का पालन किया गया। इसके बावजूद कथित तौर पर वहां व्यावसायिक निर्माण की एनओसी (NOC) जारी कर दी गई है । विशेषज्ञों का कहना है कि – यह न सिर्फ पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के तालाब-संरक्षण संबंधी दिशा-निर्देशों की भी खुली अवहेलना मानी जा सकती है।

58 दुकानों का खाका, एडवांस में ही करोड़ों?

बाजार में चल रही चर्चाओं के मुताबिक इस परियोजना के तहत कुल 58 दुकानों का ले-आउट तैयार किया गया है। आरोप हैं कि –
प्रति दुकान 3 लाख रुपये एडवांस के रूप में वसूले जा चुके हैं । दुकानों की कीमत 15 से 17 लाख रुपये तय की गई है। इस हिसाब से कुल लेन-देन लगभग 8.5 करोड़ रुपये तक पहुंचता है।

सरकारी खजाने को नुकसान, निजी जेबें भरने की आशंका

सबसे गंभीर आरोप यह है कि – इस पूरी राशि में से केवल 1.5 से 2 करोड़ रुपये ही आधिकारिक रूप से नगर पंचायत या सरकारी खाते में दिखाने की योजना है, जबकि – शेष राशि के कथित बंटवारे को लेकर समिति और जिम्मेदार अधिकारियों पर सवाल उठ रहे हैं। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सीधे – सीधे सरकारी राजस्व को नुकसान और भ्रष्टाचार का गंभीर मामला बनता है ।

नगरवासी अनजान, गुपचुप बांटे जाने की तैयारी में आवंटन पत्र

हैरत की बात यह है कि – नगर के विकास और जल स्रोत से जुड़े इतने बड़े निर्णय की कोई आमसभा, सार्वजनिक सूचना या निविदा प्रक्रिया सामने नहीं आई । आरोप हैं कि – अब चुपचाप आवंटन पत्र (Allotment Letters) बांटने की अंतिम तैयारी चल रही है, ताकि – मामला सार्वजनिक होने से पहले ही डील को अंतिम रूप दे दिया जाए।

उठ रहें कई तीखे सवाल

क्या जल संसाधन विभाग की भूमि को इस तरह नगर पंचायत द्वारा व्यावसायिक उपयोग में लिया जा सकता है ? क्या तालाबों और जल स्रोतों को पाटने पर लगे न्यायालयीन प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं हो रहा ?
बिना जनसूचना और पारदर्शी प्रक्रिया के करोड़ों की योजना किसके इशारे पर आगे बढ़ रही है ?

विचारणीय तथ्य और जांच की मांग

यदि लगाए गए आरोपों में आंशिक भी सच्चाई सामने आती है, तो यह मामला सिर्फ नगर पंचायत की कार्यशैली पर सवाल नहीं उठाता, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जल सुरक्षा और प्रशासनिक ईमानदारी पर भी गहरी चोट करता है ।
फिलहाल, क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों, सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय, निष्पक्ष जांच की मांग तेज कर दी है । अब देखना होगा कि – प्रशासन इस जल सत्यानाश के आरोपों पर क्या रुख अपनाता है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Latest